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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 78, Verses 1–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 78, verses 1–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 1-30

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवं बहूनि वर्षाणि मिथुनं निर्भरस्पृहम् । रेमे यौवनलीलाभिरमन्दाभिर्दिने दिने ॥ १ ॥ अथ यातेषु बहुषु वर्षेष्वावृत्तिशालिषु । शनैर्गलिततारुण्ये भिन्नकुम्भादिवाम्भसि ॥ २ ॥ तरङ्गनिकराकारभङ्गुरव्यवहारिणि । पातः पक्वफलस्येव मरणं दुर्निवारणम् ॥ ३ ॥ हिमाशनिरिवाम्भोजे जरा निपतनोन्मुखी । आयुर्गलत्यविरतं जलं करतलादिव ॥ ४ ॥ प्रावृषीव लतातुम्बी तृष्णैका दीर्घतां गता । शैलनद्या रय इव संप्रयात्येव यौवनम् ॥ ५ ॥ इन्द्रजालमिवासत्यं जीवनं जीर्णसंस्थिति । सुखानि प्रपलायन्ते शरा इव धनुश्च्युताः ॥ ६ ॥ पतन्ति चेतो दुःखानि तृष्णा गृध्र इवामिषम् । बुद्बुदः प्रावृषीवाप्सु शरीरं क्षणभङ्गुरम् ॥ ७ ॥ रम्भागर्भ इवासारो व्यवहारो विचारगः । सत्वरं युवता याति कान्तेवाप्रियकामिनः ॥ ८ ॥ बलादरतिरायाता वैरस्यमिव पादपम् । तदिह स्याच्छुभाकारं स्थिरं किमतिशोभनम् ॥ ९ ॥ यदासाद्य पुनश्चेतो दशासु न विदूयते । इति निर्णीय युग्मं तत्संसारव्याधिभेषजम् ॥ १० ॥ चिरं विचारयामास शास्त्रमध्यात्मसंमतम् । आत्मज्ञानैकमात्रेण संसृत्याख्या विषूचिका ॥ ११ ॥ संशाम्यतीति निश्चित्य तावास्तां तत्परायणौ । तच्चित्तौ तद्गतप्राणौ तन्निष्ठौ तद्विदाश्रयौ ॥ १२ ॥ तदा तदर्चनपरौ तदीहौ तौ विरेजतुः । तत्रैवातिघनाभ्यासौ बोधयन्तौ परस्परम् ॥ १३ ॥ तत्प्रीतौ तत्समारम्भावन्योन्यं तौ बभूवतुः । अथ साविरतं राम रमणीयपदक्रमान् ॥ १४ ॥ श्रुत्वाध्यात्मविदां वक्राच्छास्त्रार्थांस्तारणक्षमान् । इत्थं विचारयामास स्वमात्मानमहर्निशम् ॥ १५ ॥ अव्यापृता व्यापृता वा धिया धवलयेद्धया । प्रेक्षे तावत्स्वमात्मानं किमहं स्यामिति स्वयम् ॥ १६ ॥ कस्यायमागतो मोहः कथमभ्युत्थितः क्व वा । देहस्तावज्जडो मूढो नाहमित्येव निश्चयः ॥ १७ ॥ आबालमेतत्संसिद्धं मतौ चैवानुभूयते । कर्मेन्द्रियगणश्चास्मादभिन्नावयवात्मकः ॥ १८ ॥ अवयवावयविनोर्न भेदो जड एव च । बुद्धीन्द्रियगणोऽप्येवं जड एवेति दृश्यते ॥ १९ ॥ प्रेर्यते मनसा यस्माद्यष्ट्येव भुवि लोष्टकः । मनश्चैव जडं मन्ये संकल्पात्मकशक्ति यत् ॥ २० ॥ क्षेपणैरिव पाषाणः प्रेर्यते बुद्धिनिश्चयैः । बुद्धिर्निश्चयरूपैवं जडा सत्तैव निश्चयः ॥ २१ ॥ खातेनेव सरिन्नूनं साऽहंकारेण वाह्यते । अहंकारोऽपि निःसारो जड एव शवात्मकः ॥ २२ ॥ जीवेन जन्यते यक्षो बालेनेव भ्रमात्मकः । जीवश्च चेतनाकाशो वातात्मा हृदये स्थितः ॥ २३ ॥ सुकुमारोऽन्तरन्येन केनापि परिजीवति । अहो नु ज्ञातमेतेन चेत्योल्लेखकलङ्किना ॥ २४ ॥ जीवो जीवति जीर्णेन चिद्रूपेणात्मरूपिणा । चेत्यभ्रमवता जीवश्चिद्रूपेणैव जीवति ॥ २५ ॥ आमोदः पवनेनेव खातेनेव सरिद्रयः । असत्यजडचेत्यांशचयनाच्चिद्वपुर्जडम् ॥ २६ ॥ महाजलगतो ह्यग्निरिव रूपं स्वमुज्झति । सद्वासद्वा यदाभाति चित्समाधौ सति स्वतः ॥ २७ ॥ स्वरूपमलमुत्सृज्य तदेव भवति क्षणात् । एवं चिद्रूपमप्येतच्चेत्योन्मुखतया स्वयम् ॥ २८ ॥ जडं शून्यमसत्कल्पं चैतन्येन प्रबोध्यते । इति संचिन्त्य चूडाला केनैषा चित्प्रचेतनी ॥ २९ ॥ इति संचिन्तयामास चिरायेत्थं व्यबुध्यत । अहो नु चिरकालेन ज्ञातं ज्ञेयमनामयम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

उस समय इस संसार से वे दोनों विरक्त हो उठे थे। उन्होने अध्यात्मशास्त्र में ही दृढ़ अभ्यास बढा लिया था, वे एक दूसरे को अध्यात्मशास्त्र का ही स्मरण कराते थे, उनकी प्रीति उसी शास्त्र में थी एवं परस्पर उनका समस्त आरम्भ (श्रवण, प्रबोधन आदि) उसीमें होता था। हे श्रीरामजी, तदनन्तर वह चूडाला- अध्यात्मशास्त्र के तत्त्ववेत्ता ओं के मुख से संसार दुःखसमुद्र से पार करने में समर्थ सुन्दर आत्मज्ञानोपयोगी रमणीय पदक्रमों से संयुक्त शास्त्रार्थो का निरन्तर श्रवण कर-बाह्य शरीर के व्यापारो का परित्यागकर ओर धवल उग्र बुद्धि से युक्त होकर अपनी आत्मा के विषय में इस प्रकार अहर्निश विचार करने लगी। अव मैं स्वयं विवेक कर अपने आत्मा को देखती हूँ कि मैं क्या हूँ यानी इस कार्यकरण-संघातरूप शरीर में ऐसा कौन पदार्थ है, जो चेतन हो सकता हे । यह संसाररूप मोह किसको प्राप्त होता है यानी मोह जिसको प्राप्त होता है, वही उसके निवारण में समर्थ होगा, परन्तु वह कौन है, किस हेतु से कहाँ मोह प्राप्त हुआ, मोह का मूल क्या है, क्योकि मूलका ज्ञान होनेपर ही मूलोच्छेद द्वारा मोह का निरास अनायास सिद्ध हो जाता हे । देह तो जड़ और अत्यन्त मूढ हे, इसलिए वह चेतन नहीं हो सकती, यह अटल निश्चय है, इस प्रकार का निश्चय साधारण बालक तक को भी अवगत है और मैं स्थूल हूँ, गौर हूँ, इत्यादि बुद्धिवृत्ति होनेपर ही देहादि का अनुभव होता है, स्वतः नहीं, इसलिए उसमे जडता स्वतःसिद्ध ही है । हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रिय समुदाय भी इस शरीर से अभिन्न अवयवरूप ही हैँ । कभी अवयव और अवयवी में भेद नहीं रहता, इसलिए शरीररूप अवयवी के सदुश वह भी जड ही है । ज्ञानेन्द्रियसमुदाय भी शरीर के अवयवरूप ही है, इसलिए वह भी जड ही है, (५) यह दीख पडता है, क्योकि मन आदि से जड देह आदि में प्रेरणा मिलने के कारण उनके साथ संयोगयोग्यद्रव्यरूपता होने से, पृथिवी पर ढेले की प्रेरक यष्टि के सदुश, उनमें जडता ही है। संकल्पात्मक शक्ति रखनेवाला जो मन है उसे भी मैं जड़ ही मानती हूँ। जैसे गोफन से पाषाण प्रेरित होता है वैसे ही मन भी बुद्धि के निश्चयों से प्रेरित होता है। इस तरह निश्चयरूपा बुद्धि जड़तास्वभाव से ओतप्रोत है, यह अटल निश्चय है। दो तटों के मध्यवर्ती ढालू प्रदेश से जैसे नदी बहती है वैसे ही अहंकार से वह बुद्धि बहती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। अहंकार भी सारशून्य तथा मर्द के सदुश हे, इसलिए वह जड़ ही है; क्योकि बालक द्वारा जनित भ्रमरूप यक्ष के सदृश प्राणयुक्त चिदाभास द्वारा वह जनित है। चेतनाकाशरूप जीव प्राणरूप उपाधि से युक्त होकर हृदय में रहता है । वह भीतर इतना सुकुमार है कि दूसरे अपने अन्तर्यामी दिव्य चैतन्य से दीप्त होकर जीता है। अहा, मैं समझ गयी साक्षी का स्वरूप धारण कर विषयों का प्रकाशन करना ही इस चेतन का चेत्योल्लेख कलंक है, इस कलंक से दूषितप्राय हो करके यह सबको जान लेता है और अनादिभूत चैतन्यरूप से ही यह जीव प्रस्फुरित होता रहता है। जैसे सुगंध पवन से और नदी का वेग पुष्करिणी से परिचालित होता है, वैसे ही यह जीव चेत्यभ्रमों से युक्त चैतन्य से ही परिचालित होता है । चैतन्य शरीर आत्मा मिथ्याभूत जड़ विषयों के साथ अध्यास (संसर्गाध्यास और तादात्म्याध्यास) (&) यद्यपि “अणवश्च” इस सूत्र में सूत्रकार बादरायण ने सूक्ष्मभूत इन्द्रिय, प्राण आदि लिंगदेह के अवयव बतलाये हैं, इसलिए वे स्थूल शरीर के अवयव नहीं हो सकते, तथापि ज्ञानी और अज्ञानी सभी जन उनका देहावयवरूप से एवं देहसम्बन्धिरूप से अनुभव करते हैं, इसलिए उनमें जड़ता है ही, यह भाव है । करके ही जड़ जैसा बन जाता है और अपने असली प्रकाशमान धवलस्वरूप का उस प्रकार परित्याग कर देता है, जिस प्रकार तप्तजल या समुद्रजल में गिरा हुआ अग्नि अपने भास्वर प्रकाशमान स्वरूप का परित्याग कर देता है (इसलिए सत्तांश में चैतन्यभिन्नता के सदृश प्राप्त हुई "घट सत्‌ है, पट सत्‌ है" इस प्रकार की सत्ता अचित्‌ घटादिविषयों के साथ एकता का अनुभव करती है और घटादि का लय होनेपर “घट नष्ट हो गया” पट नष्ट हो गया” इस प्रकार सत्ता के अभाव का भी अनुभव करती है) । विषयों के साथ एकाग्रता होने पर जो भी कोई-चाहे वह सद्रूप हो या असद्रूप हो-वासनावेष्टित होकर स्वतः दीख पड़ता है, वही एक क्षण में पूर्णस्वरूप का परित्याग कर तत्स्वरूप हो जाता है। उक्त रीति से परमार्थतः चित्स्वरूप भी अविद्या के आवरण से अध्यास परम्परा से जड़शून्य और असत्सदृश उत्पन्न जगत्‌ का स्वरूप बुद्धि मेँ अनावृतस्वभाव चैतन्य से ही तत्तदाकारवृत्तिव्याप्ति एवं मूलाविद्यारूप आवरण के भंग द्वारा जाना जाता है । उस तरह का पहले विचारकर फिर उस चूडाला ने यह विचारा कि किस उपाय से मूलअविद्या के आवरण से रहित चिति दुश्यस्वप्न का परित्यागकर प्रबुद्ध होवे ओर तदनन्तर दीर्घकाल के बाद कहे जानेवाले प्रकार से आत्मतत्त्व को उसने पहचाना। उसे बडा ही आनन्द मिला ओर कहने लगी कि अहो, दीर्घकाल के बाद मेने सर्वविध उपद्रवो से शून्य ऐसी ज्ञातव्य वस्तु का ज्ञान प्राप्त किया, जिसे जान लेनेपर पुरुष फिर पुरुषार्थ से च्युत नहीं होता अथवा किसी भी काम्य अर्थ की हानि नहीं होती, क्योकि उसकी प्राप्ति से समस्त कामनाओं की परिपूर्ति हो जाती है अथवा दुःख का साधन समझकर किसी पदार्थ का परित्याग नहीं करता, क्योकि उस समय सभी पदार्थो में आनन्दात्मक परब्रह्मरूपता ही प्राप्त हो जाती हे