Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 77, Verses 27–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 77, verses 27–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 27-43
संस्कृत श्लोक
आलोला तां निवेक्ष्यामि बालां भुजलतानुगाम् ।
मृणालहारकुन्देन्दुवृन्दवल्लयभिलाषिणी ॥ २७ ॥
मत्कृते मदनातप्ता कदा स्यादिन्दुसुन्दरी ।
इति चिन्तापरो भूत्वा कुसुमावचयोन्मुखः ॥ २८ ॥
विजहार वनान्तेषु कुसुमोपवनेषु च ।
वनोपवनलेखासु लीलाकमलिनीषु च ॥ २९ ॥
वल्लीवलयगेहेषु विविधोद्यानभूमिषु ।
वनोपवनविन्यासवर्णनावलितासु च ॥ ३० ॥
श्रृङ्गाररसगर्भासु कथास्वरमतोन्मनाः ।
हृदि हारलसत्कायविलोलालकवल्लरीः ॥ ३१ ॥
कुमारीः पूजयामास सुवर्णकलशस्तनीः ।
एतन्मन्ये विदुर्भव्या मन्त्रिणो नृपनिश्चयम् ॥ ३२ ॥
इङ्गिताकारवेदित्वमेव मन्त्रिपदं परम् ।
अथ तस्य विवाहाय मन्त्रिवर्गो विचारयन् ॥ ३३ ॥
सुराष्ट्राधिपतेः कन्यां ययाचे यौवतान्विताम् ।
नवयौवनसंपन्नां भार्यात्वे विधिनोत्तमाम् ॥ ३४ ॥
उपयेमे स तामात्मसदृशीं प्रतिमामिव ।
चूडालेति भुवि ख्याता नाम्ना नृपतिसुन्दरी ॥ ३५ ॥
सा तं भर्तारमासाद्य रेजे फुल्लेव पद्मिनी ।
नीलनीरजनेत्रां तां चूडालां स शिखिध्वजः ॥ ३६ ॥
स्नेहाद्विकासयामास सूर्यो देवो यथाब्जिनीम् ।
अवर्धत तयोः प्रीतिरन्योन्यार्पितचेतसोः ॥ ३७ ॥
हावभावविलासाढ्यैरङ्गैर्नवलतेव सा ।
सुमन्त्र्यर्पितसर्वार्थः स सुखी सुस्थितप्रजाः ॥ ३८ ॥
राजहंस इवाब्जिन्या रेमे दयितया तया ।
अन्तःपुरेषु दोलासु लीलाकमलिनीषु च ॥ ३९ ॥
उद्यानेषु विहारेषु लतापुष्पग्रहेषु च ।
कदम्बवनलेखासु चन्दनागुरुवीथिषु ॥ ४० ॥
मन्दारदामलोलासु कदलीकन्दलीषु च ।
पुरान्तेषु वनान्तेषु दिगन्तेषु सरस्सु च ॥ ४१ ॥
जंगलेषु जनान्तेषु जम्बूजम्बीरजातिषु ।
बभूवाह्लादकं सर्वं तयोरन्योन्यचेष्टितम् ॥ ४२ ॥
सद्वर्षयोर्धुरवरैर्द्युभूम्योरिव कान्तयोः ।
नित्यमेव वियुक्तत्वात्प्रियत्वाच्चेष्टितस्य च ॥ ४३ ॥
मिथः कलाकलापस्य कोविदौ तौ बभूवतुः ।
स्वरूपमेकमेवैतौ दधतुर्मित्रतां गतौ ॥ ४४ ॥
अन्योन्यहृदयस्थत्वादिव संक्रान्तमक्षतम् ।
सर्वशास्त्रार्थवैदग्ध्यं चित्राद्यपि मुखात्प्रभोः ॥ ४५ ॥
बालः कालादिवागृह्य साऽसीत्सर्वार्थपण्डिता ।
नृत्यवाद्यादि यावच्च चूडालावदनादसौ ॥ ४६ ॥
अशिक्षत बभूवाथ कलानामतिकोविदः ।
अमावास्यामिवेन्द्वर्कावन्योन्यविलसत्कलौ ॥ ४७ ॥
मिथो हृदयसंस्थौ तौ द्वावप्यैक्यमुपागतौ ।
तौ संस्थितावेकरसावन्योन्यं दयितावुभौ ॥ ४८ ॥
पुष्पामोदाविवाभिन्नौ भूतलस्थौ शिवाविव ।
वैदग्ध्यसुन्दरमती सर्वशास्त्रार्थपण्डितौ ॥ ४९ ॥
कार्यार्थं च भुवं प्राप्तौ कमलाकमलाधवौ ।
स्नेहात्प्रसन्नमधुरौ समविज्ञातवादिनौ ॥ ५० ॥
अनुवृत्तिपरावास्तां लोकवृत्तान्ततद्विदौ ।
कलाकलापसंपन्नौ लसद्रसरसायनौ ।
शीतलस्निग्धमुग्धाङ्गौ शशाङ्कौ द्वाविवोदितौ ॥ ५१ ॥
रेजे लसच्च रतिभोगविलासकान्तमन्तःपुरेषु मिथुनं तदनुत्तमश्रि ।
ब्रह्माण्डखण्डकुहरेष्विव राजहंसयुग्मं विकासिमदमन्मथमन्दचारि ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे सदश उस बाला को भी स्वाभिलाषाजनित सन्ताप कब होगा, जिससे कि हम दोनों का संघटन
शीघ्र हो जाय।
मृणाल, हार, कुन्द ओर इन्दु सदृश प्रस्फुरित लताघरों के रूप से पुंजीतभूत वल्लियों की
अभिलाषिणी होकर मेरे लिए वह इन्दुसुन्दरी कान्ता मदनसन्तप्त कब होगी ? इस प्रकार की चिन्ता से
व्याकुल होकर कुसुमों के संग्रह मेँ उन्मुख हो बनों में और कुसुमपूर्ण उपवनों में विहार करने लगा ।
उसने अनेक वन ओर उपवनों में, लीलासरोवरों में, लतागृहों में तथा विविध उद्यान-भूमियों में विहार
किया। उन्मना होकर उसने वन और उपवन के गुणवर्णन में सम्बद्ध और श्रृंगाररस से परिपूर्ण कथाओं
में रमण किया। उसने सुवर्णकलश के सदुश स्तनवाली, हार से चमक रहे शरीर तथा चंचल मंजरियों से
युक्त कुमारियों को अपने मन में बड़ा ऊँचा स्थान दिया । चतुर मन्त्रियों ने इस प्रकार के राजा का
अभिप्राय जान लिया, क्योंकि चेष्टा ओर आकृति से अभिप्राय जान लेना ही मन्त्री का दोषों से निर्मुक्त
लक्षण है। अनन्तर राजा के विवाह के लिए विचार कर रहे मन्त्रियों ने सौराष्ट्र देश के राजा से युवतीसमूह
से मण्डित कन्या की याचना की । राजा शिखिध्वज ने नवीन वय से सम्पन्न तथा प्रतिमा के सदृश
स्वानुरूप उस उत्तम कन्या का विधिपूर्वक भार्यारूप में स्वीकार किया । राजा शिखिध्वज की सुन्दर
पृथिवीतल पर चूडाला नाम से विख्यात थी । वह अपने अनुरूप पति प्राप्तकर, विकसित पद्चिनी के
सदुश, राजित हो रही थी । वह शिखिध्वज राजा नीलकमलसदृश नेत्रवाली उस चूडाला को स्नेह से
उस प्रकार प्रसन्न रखता था, जिस प्रकार भगवान् सूर्यदेव कमलिनी को विकास द्वारा प्रसन्न रखते हैँ ।
एक दूसरे के प्रति अर्पित चित्तवाले उन दोनों की प्रीति उत्तरोत्तर बढती ही जाती थी । हाव, भाव,
विलास आदि-श्रंगार चेष्टाविशेषों से परिपूर्ण अंगों के कारण वह चूडाला सुन्दर नवलता-सी शोभती
थी। शिखिध्वज राजा को राजचित्तानुवर्ती अनुरक्त मन्त्रियों द्वारा सभी उपभोगसामग्री समय-समयपर
समर्पित की जाती थी अथवा धार्मिक मन्त्रियों द्वारा उसके याचको को वांछित अर्थो की पूर्ति की जाती
थी, उसकी प्रजा सुव्यवस्थित थी, अतएव परम सुखी वह राजा कमलिनी के साथ राजहंस के सदृश
उस दयिता के साथ रमण करता था । अन्तःपुर में, दोलाओं में, लीलासरोवरों मे, उद्यानं में, विहारों
में, लता ओर पुष्पों से शोभित घरों मे, कदम्बवन की श्रेणियों में, चन्दन ओर अगरु से सुगन्धित
वीथियों मे, मन्दारमाला सी चंचल कदली ओर कन्दलियों मे, नगर-प्रान्तों मे, वनप्रान्तों मे, दिगन्तों
में, सरोवरों में तथा जामुन, नींबू एवं जातिवृक्षों से युक्त निर्जन वनो में उस कमनीय दम्पती की
प्रमोदजनक सभी ऐसी परस्पर चेष्टाएँ हुईं, जैसी बैलों द्वारा हल से जोते गये खेतों के लिए लाभदायक
वृष्टिवाले, मेघ एवं शस्य सम्पति से कमनीय आकाश ओर पृथिवी की लोकप्रमोदजनक अन्योन्य
चेष्टाएँ होती हे । वे दोनों निरन्तर एक दूसरे से मिले हुए थे, एक दूसरे की चेष्टाएँ उन्हें प्रिय लगती थीं ।
एक दूसरे से शिक्षाग्रहण ओर एक दूसरे की समान-अर्थिता होने से वे दोनों अशेष कलाओं के विज्ञाता
हो गये थे