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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 77, Verses 7–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 77, verses 7–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 7-26

संस्कृत श्लोक

यदन्यद्बहुशो भूत्वा पुनर्भवति भूरिशः । अभूत्वैव भवत्यन्यः पुनश्च न भवत्यलम् ॥ ७ ॥ अन्यत्प्राक्संनिवेशाढ्यं सादृश्येन विवल्गति । सदृशा विषमाश्चैव यथा सरसि वीचयः ॥ ८ ॥ ता एवान्याश्च दृश्यन्ते व्यवस्थाः संसृतौ तथा । तस्माद्राजेव भूयोऽपि वक्ष्यमाणकथेश्वरः ॥ ९ ॥ भविष्यति महातेजास्तद्वृत्तान्तमिमं श्रृणु । द्वापरे पूर्वमभवदतीते सप्तमे मनौ ॥ १० ॥ चतुर्युगे चतुर्थे तु सर्गेऽस्मिन्कुरुणां कुले । जम्बूद्वीपे प्रसिद्धस्य विन्ध्यस्यादूरसंस्थिते ॥ ११ ॥ मालवानां पुरे श्रीमाञ्छिखिध्वज इतीश्वरः । धैर्यौदार्यदशायुक्तः क्षमाशमदमान्वितः ॥ १२ ॥ शूरः शुभसमाचारो मौनी गुणगणाकरः । आहर्ता सर्वयज्ञानां जेता सर्वधनुष्मताम् ॥ १३ ॥ कर्ता सकलकार्याणां भर्ता पूर्ववपुर्भुवः । पेशलस्निग्धमधुरो विदग्धः प्रीतिसागरः ॥ १४ ॥ सुन्दरः शान्तसुभगः प्रतापी धर्मवत्सलः । वदिता विनयार्थानां दाता सकलसंपदाम् ॥ १५ ॥ भोक्ता सत्सङ्गसहितः सुश्रोता सकलश्रुतेः । वेदासौ माननाशून्यः स्त्रैणं तृणवदस्पृशन् ॥ १६ ॥ पितरि स्वर्गमापन्ने बाल एवोत्तमौजसा । कृत्वा षोडशवर्षाणि स्वयं दिग्विजयं वशी ॥ १७ ॥ नूनं साम्राज्यसंपत्त्या भूमण्डलमयोजयत् । अतिष्ठद्विगताशङ्कं पालयन्धर्मतः प्रजाः ॥ १८ ॥ स धीमान्मन्त्रिभिः सार्धं यशसा शुक्लयन्दिशः । अथ गच्छत्सु वर्षेषु वसन्ते प्रोल्लसत्यलम् ॥ १९ ॥ पुष्पेषु जृम्भमाणेषु स्फुरत्सु शशिरश्मिषु । मञ्जरीजालदोलासु विटपान्तःपुरान्तरे ॥ २० ॥ रजःकर्पूरधवले वलद्दलकपाटके । आमोदविलसत्पुष्पगुलुच्छकवितानके ॥ २१ ॥ गायत्सु गहनेषूच्चैर्मिथुनेष्वलिनां मिथः । आवाति मधुरे वायौ शशिशीकरशीतले ॥ २२ ॥ कदलीकन्दलीकच्छतलपल्लवलासिनि । कान्तां प्रति बभूवास्य वसच्चेतः समुऽत्सुकम् ॥ २३ ॥ क्षीबं कुसुमसंभारसौगन्ध्यमधुरासवैः । मनो नान्यास्पदं चक्रे सवसन्तमिवोदितम् ॥ २४ ॥ उद्यानवनदोलासु लीलाकमलिनीषु च । कदा प्रणयिनीं मुग्धां हेमाब्जमुकुलस्तनीम् ॥ २५ ॥ करिष्ये कामिनीमङ्के पर्यङ्के कुङ्कुमाङ्किताम् । कदा कमलवल्लीनां दोलास्वलिरिवालिनीम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी अर्थ का स्पष्टीकरण करते है । क्योकि देखिये - एक ही आम के वृक्ष में पहले अनेक फल उत्पन्न होकर फिर कालान्तर मेँ उसी रूप के अनेक फल उत्पन्न होते हैं और उसी आम के स्कन्धपर वटवृक्ष अभूतपूर्व ही उत्पन्न होता है । काट दिये जाने पर तो फिर वहाँ नहीं उत्पन्न होता। ऐसी स्थिति में जैसे सरोवर में तरंग सदुश, विसदृश एवं पूर्व के तरंग अन्यरूप दिखाई पडते हे वैसे ही शिखिध्वज आदि के संसार में भी स्थिति है। इसलिए भूतकालीन शिखिध्वज राजा के सदश दूसरा महातेजस्वी राजा फिर भी होगा | वही कही जानेवाली कथा का नायक है । उसका यह वृत्तान्त आप सुनिये । अतीत कालीन सातवें मनु की चतुर्थ चतुयुर्गी के द्वापर युग में कुरुवंश में इसी सृष्टि में शिखिध्वज नाम का राजा हुआ था। जम्बुद्रीप मे प्रसिद्ध विन्ध्याचल के समीप में स्थित मालवदेश की उज्जैनी नगरी में वह रेश्वर्यसंपन्न शिखिध्वजनाम से प्रसिद्ध होकर समस्त देश का नियन्त्रण करता था। वह धैर्य, ओदार्य आदि धर्मो से युक्त था, उसमे क्षमा, शम, दम, विद्यमान थे, वह वीरता से परिपूर्ण था, शुभ कर्मो के अनुष्ठान में निरन्तर लगा रहता था, आत्मश्लाघा आदि दोषों से वर्जित था, थोड़े में यों कहिये कि समस्त गुणगणों का भंडार था । समस्त यज्ञो का निरन्तर अनुष्ठान करता था, उसने बड़े-बड़े धनुर्धारियों का दर्पदलन किया था, वापी, कूप, तडाग आदि लोकोपयोगी अनेक शुभ कार्यो का निर्माण किया था ओर पूर्वरूप पृथिवी का पालन करता था। वह देखने में कोमल, सम्बन्ध मेँ स्निग्ध और वाणी में मधुर था, लोक और शास्त्र मे निष्णात था, प्रेम का समुद्र था । वह सुन्दर, शान्त, भाग्यवान्‌, प्रतापी ओर धर्मवत्सल था | दूसरों के लिए विनय आदि शिक्षाप्रद वाक्यों का प्रयोग करता था, अर्थियों को अभीप्सित समस्त अर्थसम्पत्तिर्यो देता था । वह उत्तम अर्थो का भोक्ता, सत्संग से युक्त ओर समस्त वेद-शास्त्रों का उत्तम श्रोता था। वह शिखिध्वज सब कुछ जानता था, तथापि उसमें तनिक भी विज्ञता का अभिमान नहीं था । स्त्रीव्यसन आदि कातो तृणवत्‌ उसने त्याग कर दिया था । बाल्यकाल में ही उसके पिता स्वर्ग चल दिये थे । तभीसे अपने बाहुबल से जितेन्द्रिय उस शिखिध्वज ने सोलह वर्ष तक स्वयं ही दिग्विजयकर अखिल भूमण्डल को अपनी साग्राज्यसम्पत्ति में परिणत कर दिया । अनन्तर समस्त चोर आदि प्रजापीडक शत्रुओं की शंका से निर्मुक्त होकर धर्म से प्रजा का पालन कर रहा वह बुद्धिमान्‌ शिखिध्वज मन्त्रियों के साथ अपने यश से दिशाओं को धवलित करते हुए स्थित था। अनन्तर उसके बाल्यकाल के वर्ष समाप्त हो गये और यौवनकाल के वर्ष प्रारम्भ हो गये इधर वसन्त ऋतु ने भी अपना स्वरूप भलीभाँति विकसित किया। वन-उपवन में फूल खिल रहे थे, आकाश में चांदनी खिल रही थी । वृक्षों की शाखारूप अन्तःपुर भीतर-जो रजरूपी कर्पूर से धवलित; संवरणशील पत्ररूप कपाटों से युक्त तथा आमोद से विलास कर रहे पुष्प-गुच्छों के चँदुए से युक्त था-विद्यमान मंजरियों के हिंडोलों पर भ्रमरों के जोड़े मिलकर गहनतम गीत गा रहे थे। एवं शशी और सीकरों से शीतल तथा कदली और कन्दलियों के कच्छतल एवं पल्‍लवों पर नृत्य कर रहा मधुर वायु चारों ओर बह रहा था। ऐसे समय मेँ इस शिखिध्वज का (किसी एक समस्तरमणीगुणोपेत पूर्वश्रुत चूडाला में) अनुरक्त हुआ चित्त कमनीय कामिनी के प्रति उत्कण्ठित हो उठा। वसन्तयुक्त वन के सदृश कुसुमसमूहों के सौगन्ध्यरूप मधुर आसवं से मत्त उसका रागपल्लवित मन रमणी को छोडकर दूसरे किसी भी विषय में नहीं लगता था । उसकी उत्सुकता इतनी बढ़ गयी थी कि रात-दिन यह चिन्तन करता था-हेमकमलों के मुकुलं के सदृश स्तनवाली मुग्ध उस प्रणयिनी कामिनी को मैं कब लीलार्थ निर्मित सरोवरों मे, उद्यान -वन के हिडोलों पर ओर पर्यक पर अपने अंक में कुंकुमांकित करुंगा । कमल वल्लियों के दोलाओं पर, अलिनी को अलि के सदृश, अतिचपल उस बाला को मेँ अपनी भुजलता में अनुगत कब करूँगा