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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 77, Verses 1–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 77, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 1-6

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतामवष्टभ्य दृशं भगीरथधिया धृताम् । समः स्वस्थो यथाप्राप्तं कार्यमाहर शान्तधीः ॥ १ ॥ इदं पूर्वं परित्यज्य क्रोडीकृत्य मनःखगम् । शान्तमात्मनि तिष्ठ त्वं शिखिध्वज इवाचलः ॥ २ ॥ श्रीराम उवाच । कोऽसौ शिखिध्वजो नाम कथं वा लब्धवान्पदम् । एतन्मे कथय ब्रह्मन्भूयो बोधविवृद्धये ॥ ३ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । द्वापरे भवतां पूर्वमिदानीं च भविष्यतः । तेनैव संनिवेशेन दंपती स्निग्धतां गतौ ॥ ४ ॥ श्रीराम उवाच । यत्पूर्वमासीद्भगवंस्तदिदानीं तथैव हि । भविष्यति किमर्थं वै वद मे वदतां वर ॥ ५ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । जगन्निर्माणनियतेरस्या ब्रह्मादिसंविदः । ईदृश्यवस्थितिर्नित्यमनिवार्यस्वभावजा ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

मनरूप पक्षी का हृदय में निरोधकर, अविचल शिखिध्वज की नाई, आप शान्तिपूर्वक अपने स्वरूप में स्थित रहिये । श्रीरामजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, यह शिखिध्वज कौन था ओर उसने परम पद कैसे प्राप्त किया ? गुरुवर, बोधवृद्धि के लिए उसका चरित्र फिर मुझसे कहिए । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, पहले कल्प में द्वापर मे पति-पत्नी का एक जोडा हुआ था । अब इस अट्टाइसवें चतुर्युग के अग्रिम द्वापर में उसी रूप का वही एक दूसरे के प्रति स्निग्ध प्रेम रखनेवाला फिर पति-पत्नी का दूसरा जोडा उत्पन्न होगा । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, जो पूर्व मे जिस रूप का था, वह उसी रूपका फिर केसे होगा ? हे वक्ताओं मेँ श्रेष्ठ, आप उसका कारण मुझसे कहिए । तात्पर्य यह हे कि भूत ओर भविष्यत्‌ कालिक वस्तुओं के सादृश्य में हेतु क्या है महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इस जगत्‌ के निर्माण में नियतिरूप ब्रह्मादि की जो सत्यसंकल्परूपा संवित्ति है, उसकी अनिवार्यस्वभावजनित ऐसी ही निरन्तर स्थिति है यानी नियति का अनिवार्यस्वभाव ही उनके सादृश्य में कारण हे