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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 70

उनहतरर्वो सर्ग समाप्त (४) इस विषय में शिवधर्मोत्तर में कहा है : ज्ञानामृतरसो येन सकृदास्वादितो भवेत्‌ ।

6 verse-groups

  1. Verse 1विहाय सर्वकार्याणि मनस्तत्रैव धावति ॥ (जिस मन ने एक बार भी ज्ञानरूपी अमृतरस का पान कर लिय…
  2. Verse 2उक्त अर्थ की असम्भावना में हेतुभूत जो प्रपंच में दृुढ़ताभ्रम है, उसका निवारण करते हैं। मृ…
  3. Verse 3“असदेव मनागेव इस अर्थ का समर्थन करने के लिए कथा का आरम्भ करते हैं। भद्र, इस संसाररूपी स्व…
  4. Verse 4विन्ध्याचल की महाटवी में एक दीघाकृति वेताल था। किसी समय वधयोग्य अज्ञानीजनों में अनादर के…
  5. Verses 5–11संक्षेपतः प्रतिज्ञात वस्तु का विस्तार करने के लिए पुनः पहले से आरम्भकर कहते हैं । पहले वह…
  6. Verses 12–18यदि यह राजा अज्ञानी होगा तो उसमें सैकड़ों अपराध मिल सकते हैं ओर यदि ज्ञानी होगा तो वह अपर…