Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 70, Verses 12–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 70, verses 12–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 12-18
संस्कृत श्लोक
ममैतामर्थितां राजन्संभवार्थां प्रपूरय ।
प्रश्नानिमान्मयोक्तांस्त्वं सम्यगाख्यातुमर्हसि ॥ १२ ॥
कस्य सूर्यस्य रश्मीनां ब्रह्माण्डान्यणवः कृशाः ।
कस्मिन्स्फुरन्ति पवने महागगनरेणवः ॥ १३ ॥
स्वप्नात्स्वप्नान्तरं गच्छञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।
त्यजन्न त्यजति स्वच्छं कः स्वरूपं प्रभास्वरम् ॥ १४ ॥
रम्भास्तम्भो यथा पत्रमात्रमेवं पुनःपुनः ।
अन्तरन्तस्तथान्तश्च तथा कोऽणुः स एव हि ॥ १५ ॥
ब्रह्माण्डाकाशभूतौघसूर्यमण्डलमेरवः ।
अपरित्यजतोऽणुत्वं कस्याणोः परमाणवः ॥ १६ ॥
कस्यानवयवस्यैव परमाणुमहागिरेः ।
शिलान्तर्निविडैकान्तरूपमज्जा जगत्त्रयी ॥ १७ ॥
इति कथयसि चेन्न मे दुरात्मंस्तदिह निगीर्य भवन्तमात्मघातिन् ।
फलमिव तव मण्डलं ग्रसेयं प्रसभमुपेत्य जगद्यथा कृतान्तः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह राजा अज्ञानी होगा तो उसमें सैकड़ों अपराध मिल सकते हैं ओर यदि ज्ञानी होगा तो वह
अपराध कर ही नहीं सकता । सैको अपराध होने पर भी ज्ञानी की रक्षा करनी चाहिए, ऐसा मन में
निश्चय कर वेताल राजा की परीक्षा करने के लिए प्रश्नोत्तर की प्रार्थना करता है ।
हे राजन्, मेरी इस अर्थिता को, जिसका अर्थ बाधित नहीं है, आप ठीक तरह से पूर्ण कीजिये मैं
जिन प्रश्नों का कथन कर रहा हूँ इन का भलीभाँति व्याख्यान कीजिए। भद्र, किस सूर्य की किरणों के ये
ब्रह्माण्डरूपी छोटे अणु हैं और किस पवन में महागगनरूपी त्रसरेणु परिस्फुरित होते हैं ? एक स्वप्न से
दूसरे स्वप्न में जा रहा पुरुष पहले के सैकड़ों या हजारों स्वप्नो की सत्यता छोड़ता हुआ भी किस
प्रकाशक स्वच्छ सत्यात्मस्वरूप का परित्याग नहीं करता ? जिस प्रकार केले का खम्भा भीतर के भी
भीतर और उसके भी भीतर बार-बार (देखने से) केवल वल्कलमात्र ही रहता है, दूसरा नहीं, उसी
प्रकार सबके भीतर के भीतर और उसके भी भीतर ऐसा कौन अणु है, जो प्रकाशक स्वच्छ आत्मस्वरूप
है ? ब्रह्माण्ड, आकाश, भूतों के आधारभूत भुवन, सूर्यमण्डल तथा मेरू-ये सब जो बड़े-बड़े महान्
पदार्थ प्रसिद्ध हैं-ये अणुत्व धर्म न छोड़नेवाले ऐसे किस अणु की (सूक्ष्म की) अपेक्षा अत्यन्त क्षुद्र
पदार्थ हैं ? किस परमाणु महागिरि की (स्वयं सूक्ष्म होते हुए भी महान् पर्वत की), जो असल में निरवयव
ही है, शिला के भीतर यह त्रिजगती है, जिसका सार घनीभूत अव्यभिचरित सत्तामात्र है। यदि इन छः
प्रश्नों का उत्तर मुझे न दोगे, तो हे देहात्मबुद्धे, हे आत्मघातक, तुम्हें पहले फल की नाई निगलकर फिर
तुम्हारे मण्डलस्थजनों को बलपूर्वक प्राप्त कर उन्हें उस प्रकार निगल जाऊँगा, जिस प्रकार यमराज
जगत् को निगल जाता हे