Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 70, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 70, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जीवोऽजीवो भवत्याशु याति चित्तमचित्तताम् ।
विचारादित्यविद्यान्तो मोक्ष इत्यभिधीयते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
विहाय
सर्वकार्याणि मनस्तत्रैव धावति ॥ (जिस मन ने एक बार भी ज्ञानरूपी अमृतरस का पान कर लिया
है वह मन सब कार्य छोड़कर वहीं पर दौड़ता है ।)
(०0) जो पुरुष अज्ञानी हैं, वे भ्रम आदि अनेक दोषों से दूषित होने के कारण विद्यमान वस्तु को
भी असम्भावना, विपरीत भावना आदिवश अविद्यमान एवं शून्योपम ही समझते हैं, उसमें तनिक भी
आस्था नहीं करते और जो पुरुषधुरीण प्रणिपात, परिप्रश्न आदि से विधिवत् गुरुसमीप में जाकर
अज्ञाननिवृत्त्यर्थ प्रयत्न करते हैं; वे दयालु गुरु द्वारा उपदिष्ट मार्ग से श्रवण, मनन आदि द्वारा
असम्भावना आदि समस्त दोषों को दूर कर अज्ञानकाल में प्रतीयमान अविद्यमान वस्तुको भी
ज्ञानकाल में विद्यमान एवं ज्योतिःस्वरूप समझते हैं| इन द्विविध पुरुषों की दृष्टियोँ का अवलम्बनकर
एक ही वस्तु को शून्योपम और ज्योतिःस्वरूप कहा गया है ।
च
सत्तरवाँ सर्ग
चैतन्यात्मा की शुद्धि के लिए अज्ञानजनित भ्रान्तिपरम्परामें किसी एक वेताल ओर राजा का संवादकथन |
“वित्ते शान्ते शाम्यतीयं संसारमृगतुष्णिका“ इससे संसाररूपी मृगतृष्णा की शान्ति में जो चित्त
शान्तिरूप उपाय बतलाया गया है उस चित्तशान्ति में ज्ञान के आविर्भावतक किया गया विचार
ही हेतु है ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तत्त्वविचार से जीव तत्काल अजीवरूप हो जाता है और चित्त
अचित्तरूप हो जाता है; इसलिए विचाररूप उपाय से उत्पन्न हुआ कार्य-कारणरूप अविद्या का विनाश
मोक्ष है, यह तत्त्वज्ञानियों द्वारा कहा जाता है
सर्ग सन्दर्भ
उनहतरर्वो सर्ग समाप्त (४) इस विषय में शिवधर्मोत्तर में कहा है : ज्ञानामृतरसो येन सकृदास्वादितो भवेत् ।