Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verses 1–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 1-5
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सुषुप्तमौनवान्भूत्वा त्यक्त्वा चित्तविलासिताम् ।
कलनामलनिर्मुक्तस्तिष्ठावष्टब्धतत्पदः ॥ १ ॥
श्रीराम उवाच ।
वांग्मौनमक्षमौनं च काष्ठमौनं च वेद्म्यहम् ।
सुषुप्तमौनं मौनेश ब्रह्मन्ब्रूहि किमुच्यते ॥ २ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
द्विविधः प्रोच्यते राम मुनिर्मुनिवरैरिह ।
एकः काष्ठतपस्वी स्याज्जीवन्मुक्तस्तथेतरः ॥ ३ ॥
अभावितायां शुष्कायां क्रियायां बद्धनिश्चयः ।
हठाज्जितेन्द्रियग्रामो मुनिः स्यात्काष्ठतापसः ॥ ४ ॥
यथाभूतमिदं बुद्ध्वा भावितात्मात्मनि स्थितः ।
लोकोपमोपि तृप्तोऽन्तर्यः स मुक्तमुनिः स्मृतः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामभद्र, आप सुषुप्तमोनवान् होकर, चित्त की विलासिता
छोडकर तथा कल्पनारूपी मल से निर्मुक्त होकर उस परम पद में अवस्थित हो जाइये । श्रीरामचन्द्रजी
ने कहा : हे ब्रह्मन् ! वाणी का मौन, इन्द्रियमौन और काष्ठमौन तो मैं जानता हूँ लेकिन हे मोनेश,
सुषुप्तमौन किसे कहते हैं, यह (मुझे मालूम नहीं हे कृपाकर) कहिये | महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे
श्रीरामचन्द्रजी, मुनिवरो ने दो तरह के मुनि बतलाये हैं - एक काष्ठतपस्वी ओर दूसरा जीवन्मुक्त ।
आत्मतत्त्व के पर्यालोचन से शून्य शुष्क (आत्मानुभवरस से शून्य कृच्छ-चान्द्रायणादि) क्रिया में बद्ध
निश्चय ओर हठात् सम्पूर्ण इन्द्रियों को जीत रखनेवाला मुनि काष्ठतापस कहा गया हे । ओर यथार्थ
में यह संसार क्या हे, यह अच्छी तरह जानकर जो आत्मज्ञानी आत्मा में अवस्थित होता हुआ व्यवहार
में अन्य तपस्वियों के समान रहने पर भी नित्यनिरतिशयानन्दास्वाद से भीतर तृप्त रहता है वह
जीवन्मुक्त कहा गया हे
सर्ग सन्दर्भ
सड़सठवाँ सर्ग समाप्त अड़सठवाँ सर्ग लक्षणों से चार तरह का मौन और उसमें भी सुषुप्तिसम्बन्धी मौन तुर्यातीत पद में प्रतिष्ठित है - यह वर्णन ।