Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 60, Verses 22–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 60, verses 22–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
नानातैषां त्वसत्यैव सत्येनानेन चैव हि ।
कल्पिता चित्स्वभावेन वेतालः शिशुना यथा ॥ २२ ॥
सर्वत्र संस्थितिमता विगतामयेन व्याप्तं मयेदमखिलं विविधैर्विलासैः ।
चिद्रूपिणैव कलना कलितात्मनेति मत्वोपशान्तमतिरास्स्व सुखं महात्मन् ॥ २३ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायंतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम ।
स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका हो कि एकरूप यह परमात्मा नानारूप होकर उनमें कैसे स्थित रहता है 2 तो इसका समाधान
यह है कि अपने अज्ञान से जनित भ्रान्तिकल्पना से ही वह नानारूप से स्थित रहता है, न कि वस्तुतः
यह कहते है ।
श्रीरामजी, सत्यस्वरूप चित्स्वभाव इस परमात्मा द्वारा कल्पित होने से इनकी नानारूपता उस
प्रकार असत्य ही हे; जिस प्रकार बालक द्वारा कल्पित वेताल । हे महात्मन्, सर्वत्र स्थिति रखनेवाले
विकाररहित एवं चैतन्यस्वरूप मेने स्वयं ही यह जगद्रूप कल्पना की है । यह सम्पूर्ण विश्व मेरे ही विविध
विलासो से व्याप्त है । अतः "यह मुझ आत्मा की ही विभूति है, मुञ्चे छोडकर और कुछ नहीं है" यों
तत्त्वज्ञान प्राप्त कर शान्तचित्त होते हुए आप सुखपूर्वक स्थित रहिए । श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : मुनि
वसिष्ठजी महाराज के ऐसा कहनेपर दिन बीत गया, सूर्यभगवान् अस्ताचल की ओर पधारे। सभा भी
सायंकालीन विधि के लिए मुनिजी को नमस्कार कर उठ गयी ओर रात्रि बीतनेपर सूर्य -किरणों के साथ
पुनः दूसरे दिन आ जुटी