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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच । वृत्तयो यदि बोधेन संशान्ता हृदये स्फुटम् । तच्चित्तं शान्तमेवान्तर्विद्धि सत्त्वमुपागतम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार यद्यपि अर्जुन ने अपनी कृतार्थता दिखलाई, तथापि अपने उपदिष्ट तत्वज्ञान से समूल वासनाक्षय को युक्तयो से दृढ़ कर रहे श्रीभगवान्‌ कहते है। भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा : हे अर्जुन, तत्त्वज्ञान से तुम्हारे हृदय में रागादि वृत्तिर्यो यदि अशेषरूप से शान्त हो चुकीं, तो वासनात्मक चित्त भी भीतर शान्त होकर निर्वसनिकता को प्राप्त हो गया, यह तुम जानो