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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, Verses 3–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, verses 3–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 3-5

संस्कृत श्लोक

अत्र तच्चेत्यरहितं प्रत्यक्चेतननामकम् । यत्त्वशेषविनिर्मुक्तं यत्सर्वं सर्वतश्च यत् ॥ ३ ॥ न केचन विदन्त्येते तत्पदं जागतादयः । भूतलाद्गगनोड्डीनं विहंगममिवोन्नतम् ॥ ४ ॥ प्रत्यक्चेतनमाभासं शुद्धं संकल्पवर्जितम् । अगम्यमेनमात्मानं विद्धि दूरं दृशामिव ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस विषय में श्रुति प्रमाण है यदा सरवे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ (कठोप. ६।१४) (विषय सुखेच्छा आदिरूप काम, जो कि तत्त्वज्ञान से पूर्व विद्वान्‌ के हृदय में स्थित हैं, जब सर्वत्र स्वात्मदृष्टि से क्षीण हो जाते हैं, तब मनुष्य मुक्त हो जाता है और इस शरीर में ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है अर्थात्‌ ब्रह्मरूप हो जाता है।) इस निर्वासनिकतारूप सत्त्वावस्था में वह प्रत्यक्‌ चेतननामक ब्रह्म विषयों से रहित हो जाता है, जो कि व्यवहार में सर्वस्वरूप और परमार्थ में सर्वतः अशेष-विशेष से विनिर्मुक्त है। उस प्रत्यगात्मा के पद को ये चक्षु आदि इन्द्रियाँ और अज्ञानी लोग कोई भी उस प्रकार नहीं जान पाते, जिस प्रकार भूमि से आकाश में उड़कर दूर-देश में प्राप्त हुए पक्षी को । पार्थ, महाभूत आदि तेरह प्रकार के क्षेत्रों के अवभासक, शुद्धस्वरूप, संकल्परहित, निर्विषय इस प्रत्यगात्मा को इन्द्रियों से दूर (असन्निकृष्ट) सा जानो