Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच ।
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्जुन ने कहा : हे अच्युत, तुम्हारे प्रसाद से (अनुग्रह प्रयुक्त तुम्हारे उपदेश से) वासनासहित
अज्ञान नष्ट हुआ । भूले हुए कण्ठस्थित हार की नाई स्वतःसिद्ध आत्मतत्व का साक्षात्कार मैंने पाया।
ओर उससे सम्पूर्णं सन्देहो के बीजों का नाश होने के कारण बन्धुवध आदि के कर्तव्यताविषयक सन्देह
से रहित होता हुआ मेँ स्थित हूँ। अतः तत्त्व में अवस्थिति करना ओर यथाप्राप्त व्यवहारो को करना-
इस विषय में आपका जो वचन (आदेश) है, उसका मैं (पूर्णतया) पालन करूँगा
सर्ग सन्दर्भ
सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त अड्डावनवाँ सर्ग तत्त्वज्ञान से अविद्यासहित वासना का नाश तथा उसीसे अर्जुन की कृतार्थता -यह वर्णन |