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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

शान्तात्मा विगतभयोज्झितामिताशो निर्वाणो गलितमहामनोविमोहः । सम्यक्त्वं श्रुतमवगम्य पावनं तत्तिष्ठात्मन्यपहतिरेकशान्तिरूपः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

कथित उपदेश-क्रम का उपसंहार करते हुए श्रीभगवान्‌ अर्जुन की निर्वासनिक स्थिति में प्रतिष्ठा कराते हैं। हे अर्जुन, तुम असंख्य आशाओं को छोड़ते हुए प्रसिद्ध ओर पवित्र भगवद्गीतारूप मेरे उपदेश को भलीभाँति समझकर महान्‌ मोह से शून्यमना और बन्धुवधादि क्लेशो से रहित होकर वासनारहित आत्मा में चित्त का विलयकर शान्त ब्रह्मस्वरूप होकर, अतएव भयशून्य एवं परम मुक्त होकर स्थित रहो