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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 57

छप्पनर्वौ सर्ग समाप्त यत्तावनवाँ सर्ग जिस दृष्टि से मन शीघ्र ही वासनाशून्य हो जाता है ओर सुखस्वरूप अद्वितीय आत्मा अवशिष्ट रह जाता है, उस दृष्टि का उपदेश ।

10 verse-groups

  1. Verse 1वासना की शिथिलता में उपयोगी होने से पूर्व में प्रदर्शित जयत्‌ में आश्वर्यतादुष्टि का ही व…
  2. Verse 2हे अर्जुन, पहले निराश्रय चित्र के उत्पन्न हो जाने पर पीछे उसकी आश्रयभूत विशाल दीवार दीख प…
  3. Verse 3जगद्रूप चित्र में तो एक आश्चर्यमयता है ही, परन्तु उससे भी बढ़कर आश्चर्य तो यह है कि शून्य…
  4. Verse 4चिदाकाश द्वारा चिदाकाश में चिदाकाश ही विस्तृत हुआ हे
  5. Verse 5हे अर्जुन, (जब तुम जगत्‌ में चिदाकाशता की दृष्टि रखते हो तब तो) जिसमें दीर्घ भ्रमण है, ऐस…
  6. Verse 6इस वासना-वेष्टन की ज्ञान से अतिरिक्त किसी और उपाय से जो दुरुच्छेद्यता है, वह भी अधिष्ठान…
  7. Verse 7इसीलिए श्रह्मरूपता के अवलोकन से जगत्‌ में छेदन, भेदन आदि सब व्यवहारों की अयोग्यता के दर्श…
  8. Verse 8इस उपाय के द्वारा बोध से यहाँ पर तुम्हारी वासनाओं का भी ब्रह्मातिरक्तिरूप से अभाव सिद्ध ह…
  9. Verses 9–11वासना को हृदय में अणुमात्र भी स्थान न देना चाहिए, क्योकि वह हजारों अनर्थो की बीज है, इस आ…
  10. Verse 12कथित उपदेश-क्रम का उपसंहार करते हुए श्रीभगवान्‌ अर्जुन की निर्वासनिक स्थिति में प्रतिष्ठा…