Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
तेनेह वासनाभावो बोधात्संपन्न एव ते ।
यो न निर्वासनो नूनं सर्वधर्मपरोऽपि सन् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस उपाय के द्वारा बोध से यहाँ पर तुम्हारी वासनाओं का भी ब्रह्मातिरक्तिरूप से अभाव सिद्ध
ही है।
और यदि इस प्रकार का ज्ञान न हो तो वासनाबन्ध दुरुच्छेद ही है, यों पूर्वोक्त कथन का स्मरण
कराते हैं । जो वासना से निर्मुक्त नहीं है, भले ही वह समस्त शास्त्रीय कर्मो मे परायण रहा हो और
समस्त बाह्य विषयों का पण्डित हो, फिर भी उस प्रकार वह चारों ओर से अत्यन्त बद्ध है, जिस प्रकार
पिंजड़े में स्थित सिंह या तोता