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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

प्रतिबिम्बं यथादर्शे तथेदं ब्रह्मणि स्वयम् । अगम्यं छेदभेदादेराधारानन्यतावशात् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस वासना-वेष्टन की ज्ञान से अतिरिक्त किसी और उपाय से जो दुरुच्छेद्यता है, वह भी अधिष्ठान की दृढता से ही है, न कि स्वतः उसकी दृढ़ता है, यह कहते हैँ । जैसे प्रतिविम्ब अपने आधारभूत दर्पण मेँ स्थित रहता है, वैसे ही यह जगत भी, जो कि अपने अधिष्ठानरूप ब्रह्म से भिन्न न होने के कारण छेदन एवं भेदन के अयोग्य है, अपने अधिष्ठानभूत ब्रह्म में ही स्थित है