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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

भिंडिं भिंडिं खिले मत्ता पुरुपिच्छिलिसालघम् । विविच्चलित्सदालोका लासो गुलुगुलुः शिली ॥ १६ ॥ इत्याद्यनर्थकं वाक्यं तथा सत्यं स एव च । न तदस्ति न यत्सत्यं न तदस्ति न यत्त्वसौ ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी प्रकार उन्मत्त, अज्ञानी आदि द्वारा भाषित निरर्थक अपशब्दस्वरूप भी वही है, ऐसा बतलाने के लिए उनमें से कुछ का अनुकरण कर दिखलाते है । उन्मत्त पुरुष निरन्तर निरर्थक जैसे भिंडि-भिंडि, खिल-खिल, पुरुपित्‌, छिलि, सालघ, विवित्‌, चलित्‌, लास, गुलुगुलु, शिली इत्यादि वाक्यों का जो उच्चारण करते हैं, वे निरर्थक वाक्य भी तत्स्वरूप ही हैं तथा सत्य यानी साथर्क वेदशास्त्रादि शब्दसमूहस्वरूप भी वही हे । वस्तुतः ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जो इस चितितत्त्व में आरोपित होकर सत्ता प्राप्त न करता हो । संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो चितितत्त्वस्वरूप न हो