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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 15

29 verse-groups

  1. Verse 1सा) देखा
  2. Verse 2श्रीरामजी, चारों ओर से वह वृक्ष फूलों के परागों से धूसरित था, वह रत्नसदृश पुष्प- गुच्छों…
  3. Verse 3उसने केवल अपनी ऊँचाई से ही आकाश को मात नहीं कर दिया था, किन्तु तारा आदि मिलाकर द्रियुणित…
  4. Verse 4वहाँ शाखा-प्रदेश में किन्नर युवतियों के गीतों को लेकर द्विगुणित भ्रमरों की गुंजार ध्वनि ह…
  5. Verse 5वांछितरूपों को धारण करने की शक्ति से संपन्न होने के कारण स्वच्छन्द विहार करने के लिए कल्प…
  6. Verse 6अधिक ऊँचाई के कारण जनित चन्द्रबिम्ब के सम्बन्ध से मानों अूमत-रस की पूर्ति होने के कारण द्…
  7. Verse 7उसके तनों पर देवताओं ने आश्रय किया था, पत्रों पर किन्नर विश्रान्ति ले रहे थे, उसके लताकुं…
  8. Verse 8उसका अपना निजीस्वरूप अत्यन्त विस्तृत था, उसके फूलों का भीतरी रस अपने कंकणों के क्रणितों स…
  9. Verse 9श्रष्ठदेव, किन्नर, गन्धर्वं एवं विद्याधरो से वह समन्वित था, ब्रह्माण्ड की नाई विस्तृत ओर…
  10. Verse 10कलियां के समूहों से वह भरा हुआ था, मृदु पल्लवं से भरा हुआ था, खिले हुए पुष्पों से परिपूर्…
  11. Verse 11उसके ऊपर घनीभूत मंजरीयाँ थीं, घनीभूत मणिरूप गुच्छे थे, घनीभूत रत्नरूपी परिधानीय दिव्य वस्…
  12. Verse 12श्रीरामजी, चारों ओर फूलों की बाढ से सर्वत्र फल ओर पल्लवो से तथा सभी का दिल बहला करनेवाले…
  13. Verse 13हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर उपर्युक्त विशेषणो से युक्त उस वृक्ष के तने, शाखा आदि की सन्धि…
  14. Verse 14पक्षियों में विशेष बतलाते हैं। श्रीरामजी, (वहाँ) मृणाल के टुकड़ों की नाई चंद्रमा की कला क…
  15. Verse 15बाद में रहस्यभूत अर्थो के पर्यालोचन में सहायक होने के कारण प्रणव और वेद के मित्रभूत ब्रह्…
  16. Verses 16–18वहाँ निवास कर रहे अग्नि के वाहनभूत शुको का वर्णन करते हैं। तदनन्तर मैने अग्निदेव के वाहन…
  17. Verse 19आकाश में ही उत्पन्न होकर वहीं पर नष्ट हो जानेवाले अर्थात्‌ मरणपर्यन्त भूमि पर न उतरनेवाले…
  18. Verse 20ब्रह्मदेव के वाहन हंस से उत्पन्न ओर भी दूसरे हंसों को, अग्नि के वाहन शुक से उत्पन्न शुकों…
  19. Verse 21श्रीरामजी, वहाँ (मेने) दो चोंचवाले भरद्वाजनामक पक्षियों को, सुवर्ण की शिखावाले पक्षियों क…
  20. Verse 22हे राघव, उस कल्पतरु पर शकुन्तपक्षी, नीलकण्ठपक्षी, बलाकपक्षी (बकविशेष) आदि और भी अनेक पक्ष…
  21. Verses 23–24इसके बाद आकाश में स्थित हुए मैंने अत्यन्त दूर-प्रदेशस्थ घने पत्तोंवाले उस कल्पवृक्ष के दा…
  22. Verses 25–27ज्यों ही मैंने वहाँ दृष्टि डाली, त्यों ही देखा कि एकान्त मेँ स्थित दाहिने तने के उस कोटर…
  23. Verse 28वह भुशुण्ड सभा में उस प्रकार उन्नतरूप से स्थित था, जिस प्रकार काँच के टुकड़ों के बीच उन्न…
  24. Verse 29वह प्राणक्रिया के निरोध से नित्य अन्तर्मुखवृत्तिवाला, सुखी ओर प्रसिद्धतम चिरजीवी होने से…
  25. Verse 30जगत में विदित दीर्घायुवाला भुशुण्ड नाम से प्रसिद्ध वह वायसराज युगो की उत्पत्ति ओर विनाश क…
  26. Verse 31वह प्रत्येक कल्प में ईशान, इन्द्र ओर अग्नि आदि लोकपालों के जन्मों की चक्रपरम्परा को गिनता…
  27. Verse 32चतुर तथा स्निग्ध एवं मुग्ध वाणीवाला था
  28. Verse 33वह भली प्रकार ज्ञाता होने के कारण सूक्ष्मतम अर्थो को विस्पष्टकर कहनेवाला, ममता तथा अहंकार…
  29. Verse 34जिस प्रकार सरोवर सौम्य, स्वच्छ मधुर जल से युक्त, मनोहर ओर भीतर से अखण्ड शीतल, मध्य कमल के…