Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 15
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- Verse 1सा) देखा
- Verse 2श्रीरामजी, चारों ओर से वह वृक्ष फूलों के परागों से धूसरित था, वह रत्नसदृश पुष्प- गुच्छों…
- Verse 3उसने केवल अपनी ऊँचाई से ही आकाश को मात नहीं कर दिया था, किन्तु तारा आदि मिलाकर द्रियुणित…
- Verse 4वहाँ शाखा-प्रदेश में किन्नर युवतियों के गीतों को लेकर द्विगुणित भ्रमरों की गुंजार ध्वनि ह…
- Verse 5वांछितरूपों को धारण करने की शक्ति से संपन्न होने के कारण स्वच्छन्द विहार करने के लिए कल्प…
- Verse 6अधिक ऊँचाई के कारण जनित चन्द्रबिम्ब के सम्बन्ध से मानों अूमत-रस की पूर्ति होने के कारण द्…
- Verse 7उसके तनों पर देवताओं ने आश्रय किया था, पत्रों पर किन्नर विश्रान्ति ले रहे थे, उसके लताकुं…
- Verse 8उसका अपना निजीस्वरूप अत्यन्त विस्तृत था, उसके फूलों का भीतरी रस अपने कंकणों के क्रणितों स…
- Verse 9श्रष्ठदेव, किन्नर, गन्धर्वं एवं विद्याधरो से वह समन्वित था, ब्रह्माण्ड की नाई विस्तृत ओर…
- Verse 10कलियां के समूहों से वह भरा हुआ था, मृदु पल्लवं से भरा हुआ था, खिले हुए पुष्पों से परिपूर्…
- Verse 11उसके ऊपर घनीभूत मंजरीयाँ थीं, घनीभूत मणिरूप गुच्छे थे, घनीभूत रत्नरूपी परिधानीय दिव्य वस्…
- Verse 12श्रीरामजी, चारों ओर फूलों की बाढ से सर्वत्र फल ओर पल्लवो से तथा सभी का दिल बहला करनेवाले…
- Verse 13हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर उपर्युक्त विशेषणो से युक्त उस वृक्ष के तने, शाखा आदि की सन्धि…
- Verse 14पक्षियों में विशेष बतलाते हैं। श्रीरामजी, (वहाँ) मृणाल के टुकड़ों की नाई चंद्रमा की कला क…
- Verse 15बाद में रहस्यभूत अर्थो के पर्यालोचन में सहायक होने के कारण प्रणव और वेद के मित्रभूत ब्रह्…
- Verses 16–18वहाँ निवास कर रहे अग्नि के वाहनभूत शुको का वर्णन करते हैं। तदनन्तर मैने अग्निदेव के वाहन…
- Verse 19आकाश में ही उत्पन्न होकर वहीं पर नष्ट हो जानेवाले अर्थात् मरणपर्यन्त भूमि पर न उतरनेवाले…
- Verse 20ब्रह्मदेव के वाहन हंस से उत्पन्न ओर भी दूसरे हंसों को, अग्नि के वाहन शुक से उत्पन्न शुकों…
- Verse 21श्रीरामजी, वहाँ (मेने) दो चोंचवाले भरद्वाजनामक पक्षियों को, सुवर्ण की शिखावाले पक्षियों क…
- Verse 22हे राघव, उस कल्पतरु पर शकुन्तपक्षी, नीलकण्ठपक्षी, बलाकपक्षी (बकविशेष) आदि और भी अनेक पक्ष…
- Verses 23–24इसके बाद आकाश में स्थित हुए मैंने अत्यन्त दूर-प्रदेशस्थ घने पत्तोंवाले उस कल्पवृक्ष के दा…
- Verses 25–27ज्यों ही मैंने वहाँ दृष्टि डाली, त्यों ही देखा कि एकान्त मेँ स्थित दाहिने तने के उस कोटर…
- Verse 28वह भुशुण्ड सभा में उस प्रकार उन्नतरूप से स्थित था, जिस प्रकार काँच के टुकड़ों के बीच उन्न…
- Verse 29वह प्राणक्रिया के निरोध से नित्य अन्तर्मुखवृत्तिवाला, सुखी ओर प्रसिद्धतम चिरजीवी होने से…
- Verse 30जगत में विदित दीर्घायुवाला भुशुण्ड नाम से प्रसिद्ध वह वायसराज युगो की उत्पत्ति ओर विनाश क…
- Verse 31वह प्रत्येक कल्प में ईशान, इन्द्र ओर अग्नि आदि लोकपालों के जन्मों की चक्रपरम्परा को गिनता…
- Verse 32चतुर तथा स्निग्ध एवं मुग्ध वाणीवाला था
- Verse 33वह भली प्रकार ज्ञाता होने के कारण सूक्ष्मतम अर्थो को विस्पष्टकर कहनेवाला, ममता तथा अहंकार…
- Verse 34जिस प्रकार सरोवर सौम्य, स्वच्छ मधुर जल से युक्त, मनोहर ओर भीतर से अखण्ड शीतल, मध्य कमल के…