Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
दक्षिणस्कन्धशाखायां स्थितायां वै दवीयसि ।
अथाहं दृष्टवान्पुष्टपत्रायामम्बरस्थितः ॥ २३ ॥
काले काकोलवलयं मञ्जरीजालमालितम् ।
लोकालोकाचलेऽरण्ये कल्पाभ्रौघमिव स्थितम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद आकाश में स्थित हुए मैंने अत्यन्त दूर-प्रदेशस्थ घने
पत्तोंवाले उस कल्पवृक्ष के दाहिने तने की शाखापर, उस शाखा को देखने के बाद, लोकालोकपर्वत के
अरण्य में प्रलयकालीन मेघ-समूह की नाई स्थित, मंजरीसमूह से वेष्टित द्रोण कौओं का मण्डल मैंने
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