Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 121
10 verse-groups
- Verses 1–2एक सौ बीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग जिस भावना से आकृष्ट होकर जीव संसार मे फस ज…
- Verse 3एकमात्र भोग की अभिलाषा ही जीव को स्वर्ग, नरक आदि में खींच ले जाती है, अतः उसे छोड़ देना च…
- Verse 4चिन्ता रज्जु का विषयों के साथ बन्धन बतलाते हैं। “ये पुत्र, कलत्र आदि मेरे हैं ओर मैं इन प…
- Verses 5–7बन्धन का अनुवाद कर, उसके मूल कारण तादात्म्यअध्यास को भी छुड़ा रहे मनु महाराज अध्यासत्याग…
- Verse 8जीवात्मा जगत् का तो कर्ता है नहीं, फिर वह परमेश्वररूप कैसे बन जायेगा ? इस शंका पर कहते ह…
- Verse 9ये जितनी क्रियाएँ हैं, वे सब असत्य हैं, उनमें तत्त्ववेत्ता पुरुष अपनी कर्तृत्व की कैसे भा…
- Verse 10संसार के पार हो जाने से कौन-सा लाभ है, इस पर कहते हैं। जो पुरुष ब्रह्मचैतन्यस्वरूप बन गया…
- Verse 11करनेवाले परमेश्वर की रूपता नहीं बन सकती । ओर यदि जगत् चैतन्य का रूप नहीं है, तो चैतन्य क…
- Verses 12–13तब जगत् किस तरह से शान्त हो जाता है, इस पर कहते हैं। इस आत्मा का पारमार्थिकस्वरूप प्राप्…
- Verse 14जब अविद्या का नाश हो जाता है, तब पुरुष की स्थिति कैसी रहती है, इस पर कहते है । जब योगी पु…