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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्रत्वं प्रयातस्य तीर्णमृत्योरचेतसः । यो भवेत्परमानन्दः केनासावुपमीयते ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

संसार के पार हो जाने से कौन-सा लाभ है, इस पर कहते हैं। जो पुरुष ब्रह्मचैतन्यस्वरूप बन गया है, अतएव जो संसाररूपी मृत्यु से पार हो चुका है और जिसका चित्त विलीन हो गया है, ऐसे महापुरुष को जो परमानन्द प्राप्त होता है, उसकी उपमा किस आनन्द से दी जा सकती है यानी उसकी उपमा हो ही नहीं सकती । निष्कर्ष यह हाथ लगा कि संसार के पार हो जाने से पुरुष को निरूपम परमानन्द की प्राप्ति उत्तम लाभ हे