Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, Verses 5–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 5-7
संस्कृत श्लोक
अस्याहमेष मे सोऽयमहमेवं तु यैः किल ।
मोहो बुद्ध्या परित्यक्त ऊर्ध्वादूर्ध्वं प्रयान्ति ते ॥ ५ ॥
स्वप्रकाशं स्वमात्मानमवलम्ब्याविलम्बितम् ।
आस्स्व संपूरिताकाशं जगन्ति नृप पश्य हे ॥ ६ ॥
यदैवैवं चितो रूपं ततं बुद्धमखण्डितम् ।
तदैव तीर्णः संसारः परमेश्वरतां गतः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
बन्धन का अनुवाद कर, उसके मूल कारण तादात्म्यअध्यास को भी छुड़ा रहे मनु महाराज
अध्यासत्याग का फल सर्वोत्कर्ष बतलाते हैं।
“पुत्र, कलत्र आदि का मैं सम्बन्धी हूँ और पुत्र, कलत्र आदि परिवार मेरा सम्बन्धी है, मैं ऐसा
हूँ” इस तरह का मोह जिन लोगों ने बुद्धिपूर्वक छोड़ दिया है, वे महानुभाव ऊपर से भी ऊपर की
ओर जाते हैं। हे नृप, अपने आप ही प्रकाशित हो रहे अपने स्वरूप का शीघ्र ही आश्रय कर बैठ
जाओ और समस्त जगत् को परिपूर्ण चिदाकाशरूप ही देखो । जिस समय में ही तुम उस प्रकार के
पूर्ण तथा अखण्डित चैतन्यात्मा का स्वरूप जान जाओगे, उसी समय संसार तर जाओगे और
परमेश्वररूप हो जाओगो