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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 118

एक सौ सत्रहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अठारहवाँ सर्ग कहाँ से कब किसकी किसके द्वारा यह सृष्टि हुई है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर तथा आत्मदर्शन के उपायों का मनु द्वारा वर्णन ।

7 verse-groups

  1. Verse 1सबसे पहले शुद्ध संवित्‌ के जीवभाव में निमित्त बतलाते हैं। मनु ने कहा : हे राजन्‌, जैसे जल…
  2. Verse 2उपाधिरूप से आविर्भूत हुए इस संसार में (समष्टि और व्यष्टिरूप मन के कार्य में) वे जीव चक्कर…
  3. Verses 3–4अदृश्य आत्मा दृश्य मन में या सांसारिक दुःखो से पूर्ण प्राणी अविवेक रहने पर अथवा विवेक होन…
  4. Verses 5–9चाहिए ओर न इन्हें उपवास आदि के द्वारा सताना चाहिए । पदार्थमात्रता में आविष्ट (जैसे वे हैं…
  5. Verses 10–11बाहर और भीतर असग चिति के प्रवेश से जड़ जगत्‌ के स्फुरण में अनुरूप दृष्टान्त बतलाते हैं। ज…
  6. Verses 12–14कालरूपी समुद्र के लिए आत्मा में अगस्त्य मुनि का आरोप करना अत्यन्त आवश्यक है, इसलिये काल क…
  7. Verses 15–18नित्यस्वरूप आत्मा का लाभ होने पर भी उसकी अलब्धताकी भ्रान्ति से मनुष्य को शोक होता है, इसक…