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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 3, 4

संस्कृत श्लोक

अदृश्यो दृश्यते राहुर्गृहीतेन यथेन्दुना । तथानुभवमात्रात्मा दृश्येनात्मावलोक्यते ॥ ३ ॥ न शास्त्रैर्नापि गुरुणा दृश्यते परमेश्वरः । दृश्यते स्वात्मनैवात्मा स्वया सत्त्वस्थया धिया ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

अदृश्य आत्मा दृश्य मन में या सांसारिक दुःखो से पूर्ण प्राणी अविवेक रहने पर अथवा विवेक होने पर संसार के दुःखो से विमुक्त हुआ जीव कैसे दिखाई देता है, यदि ऐसी आशंका की जाय, तो उस पर कहते हैं। जैसे ग्रसित हुए चन्द्रमा के कारण अदृश्य भी राहु दिखाई देता है वैसे ही दृश्य अन्तःकरण तथा चरमसाक्षात्काररूप उसके परिणाम के कारण अनुभवमात्रस्वरूप आत्मा भी दिखाई देता है । परमेश्वर न तो अनेक शास्त्रं के द्वारा दिखाई देता है और न गुरु के द्वारा ही दिखाई देता है वह तो अपनी सत्त्वस्थ (अहन्ता-ममता से शून्य) बुद्धि से ही अपने आप दिखाई देता है