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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

मनुरुवाच । संकल्पोन्मुखतां याताः सत्यश्चिन्मात्रसंविदः । आपस्तरङ्गत्वमिव यान्ति भूमिप जीवताम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले शुद्ध संवित्‌ के जीवभाव में निमित्त बतलाते हैं। मनु ने कहा : हे राजन्‌, जैसे जल तरंगरूपता को प्राप्त होता है, वैसे ही तत्‌-तत्‌ संस्कारों से विचित्र अविद्या में शुद्धचैतन्य की प्रतिबिम्बस्वरूप संवित्तियाँ संकल्प की ओर उन्मुख होती हुइ जीवस्वरूपता को प्राप्त होती हैं

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ सत्रहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अठारहवाँ सर्ग कहाँ से कब किसकी किसके द्वारा यह सृष्टि हुई है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर तथा आत्मदर्शन के उपायों का मनु द्वारा वर्णन ।