Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, Verses 5–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, verses 5–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 5-9
संस्कृत श्लोक
पथिकाः पथि दृश्यन्ते रागद्वेषविमुक्तया ।
यथा धिया तथवते द्रष्टव्याः स्वेन्द्रियादयः ॥ ५ ॥
एतेषु नादरः कार्यः सता नैवावधीरणम् ।
पदार्थमात्रताविष्टास्तिष्ठन्त्वेते यथासुखम् ॥ ६ ॥
पदार्थमात्रं देहादि धिया संत्यज्य दूरतः ।
आशीतलान्तःकरणो नित्यमात्ममयो भव ॥ ७ ॥
देहोऽहमिति या बुद्धिः सा संसारनिबन्धनी ।
न कदाचिदियं बुद्धिरादेया हि मुमुक्षुभिः ॥ ८ ॥
नकिंचिन्मात्रचिन्मात्ररूपोऽस्मि गगनादणुः ।
इति या शाश्वती बुद्धिः सा न संसारबन्धनी ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चाहिए ओर न इन्हें उपवास आदि के द्वारा सताना चाहिए । पदार्थमात्रता में आविष्ट (जैसे वे हैं
वैसे) वे सुखपूर्वक रहा करें | हे राजन्, अपनी बुद्धि से देहादि पदार्थमात्र का (उदासीन पदार्थ
साधारण का) दूर से ही त्यागकर अपने अन्तःकरण को शीतल बनाकर शुद्ध आत्मदृष्टि से आत्मभाव
प्रचुर हो जाओ । "देह मैं ही हूँ” यह जो बुद्धि है वह संसार में फसानेवाली है, इसलिए मुमुक्षु पुरुषों
को ऐसी बुद्धि कभी नहीं अपनानी चाहिए । किंचिन्मात्र भी कलंक जिसमें नहीं है ऐसा जो
चिन्मात्रस्वरूप है उसी रूप का मैं आकाश से भी सूक्ष्म हूँ - यह जो नित्य बुद्धि है वह संसार में
फँसानेवाली नहीं है