Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, Verses 27–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, verses 27–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 27-35
संस्कृत श्लोक
कुम्भोऽपि तस्य कालेन नाशं नीतो रघूद्वह ।
यामेव दिशमादत्ते दुर्भगः सा हि नश्यति ॥ २७ ॥
कुम्भाकाशप्रलापान्ते खरक्षार्थं चकार सः ।
कुण्डं तथैव तेनासौ कुण्डाकाशपरोऽभवत् ॥ २८ ॥
कुण्डमप्यस्य कालेन केनचिन्नाशमाययौ ।
तेजसेव तमस्तेन कुण्डाकाशं शुशोच सः ॥ २९ ॥
कुण्डाकाशस्य शोकान्ते खरक्षार्थं चकार सः ।
चतुःशालं महाशालं तदाकाशमयोऽभवत् ॥ ३० ॥
तदप्यस्य जहाराशु कालः कवलितप्रजः ।
जीर्णपर्णं यथा वातस्ततः शोकपरोऽभवत् ॥ ३१ ॥
स चतुःशालशोकान्ते खरक्षार्थं चकार ह ।
कुसूलमम्बुदाकारं तदाकाशपरः स्थितः ॥ ३२ ॥
तदप्यस्य जहाराशु कालो वात इवाम्बुदम् ।
कुसूलनाशशोकेन तेनासौ पर्यतप्यत ॥ ३३ ॥
एवं गृहचतुःशालकुम्भकुण्डकुसूलकैः ।
तस्यापर्यवसानात्मा कालोऽयमतिवर्तते ॥ ३४ ॥
एवं स्थितः स विवशो गगनं गुहायां गृह्णन्गृहेण गहनेन किलात्मबुद्ध्या ।
दुःखान्तराद्धनतराद्धनदुःखजातमायाति याति च गतागतिसङ्गमूढः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुकुलश्रेष्ठ, काल से उसका वह घर भी नष्ट हो गया । भाग्यहीन
जिस किसी दिशा का ग्रहण करता है, वह नष्ट ही हो जाती है । घड़े के आकाश का शोक कर लेने
के बाद उसने आकाश की रक्षा के लिए कुण्ड का निर्माण किया ओर उसी प्रकार उसी अभिमान से
कुण्डाकाश की रक्षा के लिए तत्पर हो गया कुछ काल के वाद वनगज आदि के गिरने आदि से
इसका कुण्ड भी विनाश को उस प्रकार प्राप्त हो गया, जिस प्रकार तेज से अन्धकार विनाश को
प्राप्त हो जाता हे । कुण्डाकाश के विषय में भी उसने महान् शोक किया | कुण्ड के आकाश का शोक
करने के बाद उसने आकाश की रक्षा के लिए एक ऐसे घर का निर्माण किया, जिसमें चारों दिशाओं
में कमरे तथा बीच में एक समाकार कमरा था | फिर उरीके आकाश की रक्षा में तन्मय हो गया ।
जिसने अनेक प्रजाओं का ग्रास कर लिया है, उस काल ने इसका भी ऐसे अपहरण कर लिया, जैसे
वायु जीर्णं पत्ते का अपहरण कर लेती है । उससे भी वह शोकनिमग्न हो गया । उस चतुःशाल घर
के शोक के बाद उसने आकाश की रक्षा के लिए मेघाकार कुसूल (धान्य रखने का कोठार) बनाया
ओर फिर उसीके आकाश की रक्षा में निरत हो गया । उसके उस कुसूल को भी काल ने एसे अपहत
कर दिया जैसे वायु मेघ को अपहत कर देता है । उस कुसूलविनाश के शोक से वह खूब ही सन्तप्त
हो गया । इस प्रकार घर, चतुःशाल, कुण्ड ओर कुसूल आदि से आकाश की रक्षा कर रहे उस
मिथ्यापुरुष का यह कभी समाप्त न होनेवाला काल बीतता ही जाता था हे श्रीरामचन्द्रजी, उस
रीति से गहन घर, कूप, कुण्ड आदि उपाधियों से आकाश को आत्मबुद्धि से उदर में पकड़कर स्थित
रहा वह मिथ्यापुरुष गमनागमन की आसक्ति से मूढ अतएव विवश होकर उनके अभिमान से ही घर
आदि का निर्माण, रक्षण ओर विनाश होनेपर एक दुःख से अति कठिन दुसरे दुःख में आता और
जाता रहता हे