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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

निरंशं शान्तसंकल्पं सर्वभावात्मकं ततम् । परमादप्यणोः सूक्ष्मं चिन्मात्रं त्वमनोमयम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंकार का बाध हो जाने पर अवशिष्ट हुआ मैं किस प्रकार का हूँ, इस पर कहते हैं । जब अहंकार का बाध हो जाता है, तब आप अंशशून्य, संकल्प-विकल्पों से रहित, समस्त पदार्थरूप, व्यापक, परमाणु से भी सूक्ष्म, मन से रहित चिन्मात्रस्वरूप होकर रह जाते हैं