Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
असंभवत्यहंकारे क्व ते मरणजन्मनी ।
नभःक्षेत्रे तथा व्युप्तं केन संगृह्यते फलम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
यत्न से जब तक उसका निवारण नहीं किया जायेगा, तब तक कैसे जन्म-मरण का भय निकलेगा,
इस पर कहते है ।
जब अहंकार ही असम्भव हे, तब आपके जन्म-मरण ही कैसे ? ऐसा कौन हे, जो आकाश में पेड
लगाकर फल बटोरता हो । अहंकाररूपी खेत के रहने पर ही कामादि वासनाएँ अंकुरित हो सकती हैं,
परंतु उसका बाध हो जाने पर वे कुछ नहीं कर सकतीं, यह भाव है