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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, Verses 6–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, verses 6–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 6-13

संस्कृत श्लोक

यथाम्भसस्तरङ्गादि यथा हेम्नोऽङ्गदादि च । तदेवातदिवाभासं तथाहंभावभावितः ॥ ६ ॥ अबोधेन जगत्सर्वं मायामयमिव स्थितम् । बोधेन सकलं ब्रह्मरूपं संपद्यतेऽनघ ॥ ७ ॥ द्वित्वैकत्वमती त्यक्त्वा शेषस्थः सुखितो भव । मा दुःखितो भव व्यर्थं त्वं मिथ्यापुरुषो यथा ॥ ८ ॥ मायेयमतिदुष्पारा सांसारी गाढतां गता । शरदा मिहिकेवाशु बोधेनायाति तानवम् ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच । परमामागतोऽस्म्यन्तस्तृप्तिं ज्ञानामृतेन ते । अवग्रहभयाक्रान्तः स्वासारेणेव चातकः ॥ १० ॥ अमृतेनेव सिक्तोऽहमन्तर्गच्छामि शीतताम् । उपर्यपि समस्तानां तिष्ठाम्यतुलसंपदाम् ॥ ११ ॥ न तृप्तिमनुगच्छामि वचांसि वदतस्तव । ऐन्दवीनां मरीचीनां चकोरस्तृषितो यथा ॥ १२ ॥ तृप्तोऽपि भूयः पृच्छामि त्वां प्रश्नमिममीश्वर । को नाम तृप्तोऽप्यग्रस्तं न पिबत्यमृतासवम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त चिन्मात्ररूप मैं अहम्भाव से युक्त होकर किस तरह का हो गया। इस पर कहते हैं। जैसे जल के तरंग आदि जलरूप होते हुए भी जल से भिन्न की नाई भासते हैं अथवा जैसे सुवर्ण के कटक आदि सुवर्णरूप होते हुए भी सुवर्ण से भिन्न की नाई भासते हैं, वैसे ही आप चिन्मात्र होते हुए भी अहम्भाव से युक्त होकर उससे भिन्न की नाई भासने लग गये हैं| हे पापशून्य, सम्पूर्ण जगत्‌ आत्मा के अज्ञान से ही मायामय बनकर मानों स्थित हो जाता है और आत्मा के ज्ञान से वह सब ब्रह्मरूप बनकर स्थित हो जाता है । श्रीरामजी, यह कार्य है ओर यह कारण है - इन दोनों बुद्धियों का त्याग कर उनमें अनुगत सन्मात्र को बचाकर उसी में अपनी स्थिति बनाइए ओर सुखी हो जाइए जिस तरह मिथ्यापुरुष अनुगत वची हुई वस्तु में प्रतिष्ठित न होकर दुःखी हुआ, उस प्रकार व्यर्थ दुःखी मत होइए । यह अत्यंत गाढ़ जो संसार की माया है, उसका पार पाना यद्यपि अत्यंत कठिन है, तथापि जैसे शरद्‌ ऋतु कुहरे को काट डालती है, वैसे ही उसे आत्मज्ञान शीघ्र काट डालता हे । श्रीरामजी ने कहा : गुरुवर, आपके ज्ञानरूपी अमृत से मैं अपने अन्दर ऐसे परम सन्तुष्ट हो गया हूँ, जैसे वृष्टि के प्रतिबन्ध से (अभाव से) भयभीत हुआ चातक देव से प्राप्त हुई वृष्टि से सन्तुष्ट हो जाता है | महाराज, अमृत के सदृश ज्ञान से अभिषिक्त हुआ मैं भीतर शीतलता का महान्‌ अनुभव कर रहा हूँ ओर हिरण्यगर्भ की सम्पत्तिपर्यन्त जितनी उत्तमोत्तम सम्पत्तियाँ हैं उन सबके सिर पर रहनेवाली निरतिशय आनन्दरूपी सम्पत्ति के ऊपर मैं अपना आधिपत्य जमा कर स्थित हूँ। परंतु मधुर वचन कह रहे आपकी उक्तियों के आस्वाद से मुझे ऐसे तृप्ति नहीं होती, जैसे चन्द्रमा की किरणों के आस्वाद से प्यासे चकोर को तृप्ति नहीं होती। भगवन्‌, ज्ञातव्य तत्त्व के ज्ञान से यद्यपि मैं तृप्त तो हो गया हूँ, तथापि आपसे यह प्रश्न पूछता हू । भला बतलाइये तो सही कि कौन ऐसा प्राणी है, जो तृप्त होता हुआ भी सामने पड़े हुए अमृतरूपी पेय को न पीता हो ?