Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, Verses 1–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति प्राप्य परं योगमुपदेशमनुत्तमम् ।
जीवन्मुक्तो बभूवासौ ततो देवगुरोः सुतः ॥ १ ॥
निर्ममो निरहंकारश्छिन्नग्रन्थिः प्रशान्तधीः ।
कचो यथा स्थितो राम तथा तिष्ठाविकारवान् ॥ २ ॥
अहंकारमसद्विद्धि मैनमाश्रय मा त्यज ।
असतः शशशृङ्गस्य किल त्यागग्रहौ कुतः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वार्थमयम्” इस शब्द का सव पदार्थो का सारभूत भी अर्थ है, इसको दृष्टान्तपूर्वक दशति हुए
प्रकृत का उपसंहार करतेहै।
जैसे चारों दिशाओं में स्थित फल, पुष्प ओर पत्तों का हेतुभूत एवं सारभूत वृक्षों में रहनेवाला रस
है, वैसे ही तुम समस्त जगत् का कारणभूत ओर सारभूत भीतर रहनेवाला सर्वदा ही स्थित, अत्यन्त
विमल, अनन्त, नित्य चिदात्मस्वरूप ही हो । हे कच, अखण्ड-अद्वय सन्मात्रस्वरूप बने हुए तुम्हारी
यह परिच्छिन्न अहंबुद्धि कौन-सी चीज है अर्थात् कोई नहीं ।४१॥
एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त
एक सौ बारहवा सर्ग
कच की आख्यायिका से प्रबुद्ध हुए रामजी के प्रश्न से वसिष्ठजी द्वारा
आकाश की रक्षा करनेवाले मिथ्यापुरुष का आख्यान-कथन ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, उस देवगुरु से अपनी आत्मा को परमात्मा के साथ
एकरूपता से सम्पन्न करानेवाला उत्तमोत्तम उस प्रकार का परम उपदेश पाकर उनका पुत्र जीवन्मुक्त
हो गया । हे रामजी, जिस प्रकार बृहस्पति का पुत्र कच ममतारहित, अहंकारशून्य, मोहरूपी गोठ से
निर्मुक्त और शान्तवुद्धि होकर स्थित रहा उसी प्रकार आप भी निर्विकार होकर स्थित हो जाइए । भद्र,
इस अहंकार को आप असत् जानिये, इसका न तो आश्रय कीजिए ओर न त्याग ही कीजिए, क्योकि
असत् खरगोश के सींगों का कहीं आश्रय और त्याग किसी से किया जा सकता है ?