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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 108, Verses 29–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 108, verses 29–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 29-39

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । मन्युर्मम न बालेऽन्तर्विद्यते ख इव द्रुमः । केवलं साधुनिन्द्यत्वान्नेच्छामि त्वामहं वधूम् ॥ २९ ॥ सुहृत्त्वेन वनान्तेषु पूर्ववत्सुखमङ्गने । वीतरागतया नित्यं सममेव रमावहे ॥ ३० ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । एवं समतया तत्र स्थिते तस्मिञ्छिखिध्वजे । चूडाला चिन्तयामास तत्सत्त्वेनोदिताशया ॥ ३१ ॥ अहो वत परं साम्यं भगवानयमागतः । वीतरागतयाऽक्रोधो जीवन्मुक्तोऽवतिष्ठते ॥ ३२ ॥ नैनं हरन्ति ते भोगा न महत्योऽपि सिद्धयः । न सुखानि न दुःखानि नापदो न च संपदः ॥ ३३ ॥ चिन्तिताः सकला एकं प्रयान्त्येनमनिन्दिताः । मन्ये महर्द्धयः कान्ता नारायणमिवापरम् ॥ ३४ ॥ आत्मवृत्तान्तमखिलं तमेनं स्मारयाम्यहम् । कुम्भरूपमिदं त्यक्त्वा चूडालैव भवाम्यहम् ॥ ३५ ॥ इति संचिन्त्य चूडाला चूडालावपुरक्षता । दर्शयामास तत्राशु त्यक्त्वा मदनिकावपुः ॥ ३६ ॥ तस्मान्मदनिकादेहाच्चूडाला निर्गतेव सा । बभावस्य पुरो युक्ता निर्गतेव समुद्गकात् ॥ ३७ ॥ तां ददर्शानवद्याङ्गीं पुनः प्रणयपेशलाम् । कान्तां मदनिकामेव चूडालां दयितां स्थिताम् ॥ ३८ ॥ समुदितामिव माधवपद्मिनीमुपगतामिव भूमितलाच्छ्रियम् । प्रकटितामिव रत्नसमुद्गकात्परिददर्श निजां दयितां नृपः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा शिखिध्वज ने कहा : हे बाले, मेरे अन्तःकरण में तो तुम्हारे कृत्य से, आकाश में वृक्ष की नाई, तनिक भी क्रोध नहीं है । केवल शिष्टजनों की निन्दा के भय से मैं तुम्हें अपनी वधू के रूप में अब नहीं चाहता हे अंगने, अब हम दोनों केवल मित्रता से इन वनप्रान्तों में पहले की नाई रागनिर्मुक्त होकर निरन्तर साथ-साथ ही सुखपूर्वक खेल-कूद किया करेंगे । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, वहाँ पर उस तरह अविकृत रूप से अब राजा शिखिध्वज स्थित थे, तब परीक्षित उसके रागद्वेष की वासनाओं से निर्मुक्त अन्तःकरण से अत्यन्त प्रसन्न हुई वह चूडाला अपने मन में विचार करने लगी। हो ! निश्चय ही ये मेरे भगवान्‌ शिखिध्वज सर्वोच्च समभाव को प्राप्त हो गये हे । राग से निर्मुक्त हो जाने के कारण इन में क्रोध का तो नामो -निशान नहीं रहा, ये सचमुच जीवन्मुक्त होकर स्थित हैँ । इन्द्र के द्राश्चय हरा जो उत्तमोत्तम भोग ओर बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ दी जा रही थीं, उन भोगो ने और सिद्धियों ने इनको अपनी ओर तनिक भी नहीं खींचा | इन को न सुख, न दुःख, न आपत्तियाँ और न सम्पत्तियाँ ही अपनी ओर खींच सकती हैं । मैं जिन्हें जीवन्मुक्तो का लक्षण मानती हूँ वे सब शान्ति, क्षमा, धीरज, तृप्ति आदि प्रशंसित ओर कमनीय बड़ी-बड़ी ऋद्धिर्यो इस समय अकेले इन्हीं का आश्रय कर रही हे । अब मेँ इन्हे दूसरे नारायण के रूप में मान रही हूँ। बड़े-बड़े विशिष्ट गुणों की स्थिति हो जाने के कारण इन्हें मेरे वृत्तान्त का यदि स्मरण दिलाया जाय, तो बहुत अच्छा हो । चूँकि ये पूर्णरूप से योग्य हो चुके हे, इसलिए मैं अपना समस्त वृत्तान्त इन्हे स्मरण कराती हूँ। अब मैं इस कुम्भरूप का परित्याग कर चूडाला बन जाती हूँ। ऐसा विचारकर अटल निश्चयवाली चूडाला ने मदनिका के शरीर का त्याग कर राजा को वहाँ पर तत्क्षण ही चूडाला शरीर बतलाया । उस समय ऐसा मालूम पड़ने लगा, मानों मदनिका के शरीर से चूडाला निकली हो ओर राजा के सामने योगधारणा से युक्त वह ऐसी शोभने लगी जैसे किसी पिटारी में से निकली हुई कोई रत्नश्री किसी के सामने शोभती हो। राजा शिखिध्वज ने निर्मल अंगों से सुशोभित, फिर स्वामी के चित्त को अनुरक्त करने में चतुर, कमनीय मदनिका को ही, अपनी पूर्व-प्रियभार्या चूडाला के रूप में देखा । वसन्तकाल में खिली हुई सुन्दर पद्मिनी की नाई (अथवा आविमूर्त विष्णु की पद्महस्ता लक्ष्मी की नाई), जब रामावतार की समाप्ति हो जाने पर श्रीरामचन्द्र विष्णुरूप बन गये थे तब पहले सीता के रूप में भूमि के गर्भ में प्रविष्ट हुई ओर फिर उससे निकली हुई लक्ष्मी की नाई तथा पिटारी से प्रकट हुई रत्नशोभा की नाई उस राजा ने अपनी भार्या चूडाला को देखा