Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 108, Verses 13–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 108, verses 13–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 13-21
संस्कृत श्लोक
अभ्युन्मुखं समानन्दमुद्दाममदमन्थरम् ।
परस्पराहतं पुष्पैर्वक्षोभ्यां पीडितस्तनम् ॥ १३ ॥
तदालोक्याविकारेण चेतसालं तुतोष सः ।
अहो सुखं स्थितौ खिङ्गावित्याह स शिखिध्वजः ॥ १४ ॥
तिष्ठताङ्ग यथाकामं सुखं खिङ्गौ यथास्थितम् ।
विघ्नं माकरवं भीतावित्युक्त्वा निर्जगाम सः ॥ १५ ॥
ततो मुहूर्तमात्रेण प्रपञ्चं तमुपेक्ष्य सा ।
निर्ययौ दर्शयन्ती स्वं रतिफुल्लाकुलं वपुः ॥ १६ ॥
उपविष्टं ददर्शैनं नृपं हेमशिलातले ।
समाधिसंस्थमेकान्ते मनाग्विकसितेक्षणम् ॥ १७ ॥
तं प्रदेशमुपागम्य लज्जावनमितानना ।
तूष्णीमासीत्क्षणं खिन्ना म्लाना मदनिकाङ्गना ॥ १८ ॥
क्षणाच्छिखिध्वजो ध्यानाद्विरतस्तामुवाच ह ।
अत्यन्तमधुरं वाक्यमिदमक्षुब्धया धिया ॥ १९ ॥
तन्वि किं शीघ्रमेव त्वं विघ्नितानन्दमागता ।
आनन्दायैव भूतानि यतन्ते यानि कानिचित् ॥ २० ॥
भूयस्तोषय तं गच्छ कान्तं प्रणयवृत्तिभिः ।
परस्परेप्सितस्नेहो दुर्लभो हि जगत्त्रये ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
ये एक दूसरे के सामने ही मुख किये हुए हैं, बड़े आनन्द में मस्त हैं, प्रबल काममद के
कारण इनको बाह्यवस्तु की ओर कुछ भी ध्यान नहीं है, फूलों से एक दूसरे का ताडन कर रहे हैं और
छातियों से ही स्तनों का मर्दन कर रहे हैं। यह सब देखकर राजा क्रोधरूपी विकार से रहित अन्तःकरण
से अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ और उसने यह कहा : बहुत ही आनन्द का विषय है कि ये दोनों व्यभिचारी कैसे
आनन्दपूर्वक अवस्थित हैं। अकस्मात् आये हुए अपने को देखकर डरे हुए उन दोनों के प्रति राजा ने
कहा : हे प्रिये, तुम दोनों अपनी इच्छा के अनुसार सुख से जैसे स्थित हो, उसी तरह स्थित रहो, मैं तुम
लोगों के कार्य में विघ्न क्यों डालूँ। यों कहकर वे राजा वहाँ से हट गये । तदनन्तर एक मुहंर्तमात्र में उस
मायाजाल का उपसंहार कर प्रिय उपपति के साथ संभोग करने के कारण विकसित शरीर को दिखलाती
हुई वह चूडाला लताकुंज से बाहर निकल आई। इस राजा को उसने सुवर्णं की शिला पर बैठे हुए देखा ।
वे एकान्त में समाधि लगाकर बैठे थे, उनके नेत्र कुछ-कुछ विकसित (खुले हुए) थे। जहाँ राजा बैठे हुए
थे, उस प्रदेश में जाकर लज्जा से विनम्रमुख होकर अंगना मदनिका क्षणभर चुपचाप खड़ी हो गई। उस
समय उसके मन में अपने पापकर्म के लिए भारी खेद था और उसका मुख फीका पड़ गया था। एक क्षण
के बाद ध्यान से उठकर राजा शिखिध्वज उस मदनिका के प्रति क्षोभरहित अन्तःकरण से अन्यन्त
मधुर यह वाक्य बोले : हे तन्वि, क्या शीघ्र ही किसीने तुम्हारे आनन्द में बाधा पहुँचाई, अच्छा कहो,
तुमने आनन्द का उपभोग तो किया न। समस्त प्राणी केवल एकमात्र आनन्द के लिए ही जिस-किसी
वस्तु के ग्रहण में प्रयत्न करते हैं हे विलासिनि, जाओ, फिर उस अपने कान्त को प्रेमभरी चेष्टाओं से
सन्तुष्ट करो, क्योकि तीनों जगत् में परस्पर स्वाभाविक स्नेह बड़ा दुर्लभ होता हे