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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 108, Verses 1–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 108, verses 1–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 1-12

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तां मायां शममानीय चूडाला समचिन्तयत् । दिष्टया भोगेच्छया नायं ह्रियते वसुधाधिपः ॥ १ ॥ शान्तः समसमाभोग एवं शक्रसमागमे । असंरम्भमहेलं च कृतवान्व्यावहारिकम् ॥ २ ॥ भूय एव प्रपञ्चेन विमृशाम्येव सादरम् । रागद्वेषप्रधानेन केनचिद्बुद्धिहारिणा ॥ ३ ॥ इति संचिन्त्य सा रात्राविन्दावभ्युदिते वने । गृहीतमङ्गनारूपं कान्ता मदनिका सती ॥ ४ ॥ वाते वहति फुल्लाढ्ये मधुरामोदमांसले । संध्याजप्यपरे नद्यास्तीरसंस्थे शिखिध्वजे ॥ ५ ॥ संतानकलतागेहं नीरन्ध्रैः पुष्पगुच्छकैः । शुद्धान्तं वनदेवीनां प्रविवेश मदान्विता ॥ ६ ॥ तत्र संकल्पिते पुष्पशयने माल्यमालिता । कण्ठे संकल्पितं कान्तं खिङ्गमादाय संस्थिता ॥ ७ ॥ आगत्यान्विष्य कुञ्जात्स प्रददर्श शिखिध्वजः । लतागेहे मदनिकां कण्ठे खिङ्गं मनोहरम् ॥ ८ ॥ कुन्तलावलितस्कन्धं समालब्धं च चन्दनैः । शयनावृतिनिक्षेपपर्याकुलितशेखरम् ॥ ९ ॥ हेमाभे द्विगुणाकारबालाबाहूपधानके । संसक्तश्रवणापाङ्गकपोलतलकुन्तलम् ॥ १० ॥ मिथुनं तद्ददर्शाथ मिथः प्रहसिताननम् । अन्योन्यवदनासक्तं छन्नं कल्पलतांशुकैः ॥ ११ ॥ आलोलमाल्यशयनं मदनातुरमाकुलम् । अङ्गलग्नच्छलेनात्मरागमन्योन्यमर्पयत् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ सातवाँ सर्गं समाप्त एक सौ आठवाँ सर्ग क्रोध की परीक्षा करने के लिए माया से चूडाला का राजा को उपपतिसमागम दिखलाना तथा अन्त में अपना असली रूप दिखलाना - यह वर्णन । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, इन्द्र के आने की माया का उपसंहार कर चूडाला विचारने लगी - सौभाग्य का विषय है कि यह भूमिपति विषयभोगों की लालसाओं से आकृष्ट तो नहीं हुआ। इन्द्र के आने पर भी यह इस प्रकार शान्त रहा ओर उसके मुख आदि अवयवों की स्थिति भी आकाश के सदृश विशुद्ध रही । इसने इन्द्र का अर्घ्य, पाद्य आदि से पूजन भी किसी तरह के क्षोभ के विना शिष्टो के-जेसा उचितरूप से किया। अब मैं दूसरी बार भी इसकी राग-द्वेष से भरे, बुद्धि में क्षोभ पैदा करानेवाले किसी मायाप्रपंच को रचकर आदरपूर्वक परीक्षा करती हूँ (देखें, उत्तीर्ण होता हैं कि नहीं) उस प्रकार विचार कर वह रात्रि में चन्द्रमा का उदय हो जाने पर कमनीय सती मदनिका के रूप में परिवर्तित हो गई । उस समय जव कि अरण्य में खिले फूलों से युक्त वृक्ष ओर लताओं की समृद्धि से परिपूर्ण, मधुर सुगन्ध से भरपूर मलयपर्वत की वायु बह रही थी, राजा शिखिध्वज भी सन्ध्याकाल के जपकर्म में तत्पर होकर भागीरथी के तट पर स्थित थे, तब सघन फूलों के गुच्छों से युक्त, वनदेवियों के अन्तःपुररूपी देवतरुओं के छोटे-छोटे लताकुंज मेँ उसने काममद से युक्त होकर प्रवेश किया । वहाँ मालाओं से अलंकृत होकर वह मदनिका संकल्प से रचित पुष्पशय्या पर माया से बनाये गये अपने अनुरूप युवा जार पुरुष को - जिसको कि दाढ़ी-मूँछ निकली नहीं थी अतएव जो दाढी-मूँछवाले शिखिध्वज की अपेक्षा अधिक सुन्दर लगता था, जिसे लताकुज में प्रवेश के पहले से ही उसने अपने गले लगाया था- लेकर लेट गई । जपकर्म के अनन्तर सन्ध्या के स्थान कुज से उठकर राजा ने मदनिका का अन्वेषण आरम्भ किया । अन्वेषण करने पर उसने लताकुज में मदनिका को ओर उसके गले में लगे सुन्दर जार पुरुष को देखा । उस जार युवा के कन्धे मदनिका के केशों से ओर उसके अपने दीर्घ केशों से वेष्टित हो गये थे। उसका सारा शरीर चन्दनो से अवलिप्त था। उसके माथे पर के केश-भूषण शय्यापर बार-बार इधर-उधर के परिवर्तन एवं परस्पर के मर्दनों से अस्त-व्यस्त हो गये थे । सुवर्ण सदृश कान्तिवाले, मोड़ने के कारण आकार में द्विगुण हुए मदनिका के भुजरूपी तकिये पर वह जार अपना कान, आँख का आखिरी भाग, कपोलतल ओर केश रखकर लेट रहा था । शिखिध्वज ने तदनन्तर यह भी देखा कि स्त्रीपुरुष दोनों के मुख परस्पर के हास से पूर्ण है । एक दूसरे का मुख एक दूसरे के मुख से लगा हुआ है । इन्होने कल्पलता के वस्त्र पहिने हे । उन्होंने चंचल माल्ययुक्त पुष्पशय्यापर शयन किया है, ये काम से आतुर ओर पूर्ण व्याकुल हैं, अपने अंगों के आलिंगन के बहाने एक दूसरे को अपना प्रेम समर्पण कर रहे हैं