Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, Verses 19–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, verses 19–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 19-21
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
आत्मना किं कृता दूरादभ्यागमकदर्थना ।
देवराज यथा तन्मे प्रसादाद्वक्तुमर्हसि ॥ १९ ॥
इन्द्र उवाच ।
इमे वयमिहायातास्त्वद्गुणातिशयेन खात् ।
हृदि लग्नेन सूत्रेण खगा वनगता इव ॥ २० ॥
उत्तिष्ठ स्वर्गमागच्छ तत्र सर्वे त्वदुन्मुखाः ।
त्वद्गुणश्रवणाश्चर्याः स्थिता देवाङ्गनागणाः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे देवराज, आपने स्वयं इतने दूर से यहाँ आने का परिश्रम क्यों उठाया ।
जिस प्रयोजन को लेकर आप यहाँ पधारे हों, उसे प्रसन्नतापूर्वक कहिए । इन्द्र ने कहा : हे राजन्, हम
लोगों के हृदय में लगे हुए सूत्ररूपषी आपके सद्गुणो के आधिक्य से वशीभूत होकर ये हम यहाँ उस तरह
आ गये है, जिस तरह हृदय मे बँधे हुए सूत्र से वशीभूत होकर अरण्य के पक्षी आ जाते हें । राजन्, उविये
और स्वर्ग चलिये, क्योकि वहाँ पर आपके गुणों के श्रवण से जनित महान् आश्चर्य से चकित हुए समस्त
देवता ओर देवांगनाएँ आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रही हैं