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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, Verses 10–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, verses 10–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 10-18

संस्कृत श्लोक

हस्तलभ्योदितामोघमन्दारवनमालिते । एवं शुक्तिमतः पृष्ठे पक्षं कल्पलतागृहे ॥ १० ॥ मासद्वयं पक्षवतो गिरेर्दक्षिणदिक्तटे । पारिजातवने देवपुष्पस्तबकमण्डपे ॥ ११ ॥ जम्बूखण्डतले मेरोः पादे जम्बूनदीतटे । जाम्बूनदमये मासं जम्बूफलरसासवैः ॥ १२ ॥ दशोत्तरकुरूणां च मण्डले दिवसानि तौ । कोसलेषूत्तरस्थेषु सप्तविंशतिवासरान् ॥ १३ ॥ एवमन्येषु देशेषु विचित्रेषु महीभृताम् । स्थितवन्तौ महाभागौ सुहृदौ निशि दम्पती ॥ १४ ॥ ततो यातेषु मासेषु शनैः कतिपयेषु सा । चूडाला चिन्तयामास देवपुत्रकरूपिणी ॥ १५ ॥ सुरूपभोगभारेण परीक्षेऽहं शिखिध्वजम् । मा कदाचन चेतोऽस्य भोगेषु रतिमेष्यति ॥ १६ ॥ इति संचिन्त्य चूडाला मायया विपिनावनौ । आगतं दर्शयामास ससुराप्सरसं हरिम् ॥ १७ ॥ इन्द्रमभ्यागतं दृष्ट्वा परिवारसमन्वितम् । यथावत्पूजयामास वनसंस्थः शिखिध्वजः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

दो मास तक मेनाक पर्वत के दक्षिण के तट पर पारिजात वन में, जो कि देवताओं में भोग्य फूलों के गुच्छं का मण्डप ही था, रह कर विहार किया । तदनन्तर मेरूपर्वत के दक्षिण भाग की ओर स्थित जामुन के वृक्षों के वनखण्ड के नीचे विद्यमान जम्बू नदी के किनारे, जो कि हाथी के जैसे बड़े-बड़े जामुनों के रसरूपी आसवं के कारण जामुनों का नदरूप हो गया था, मासभर निवास किया उत्तरी कुरूओं के मण्डल में वे दस दिन तक रहे ओर सत्ताईस दिन तक उत्तर के कोशल देश में रहे । रात में पति- पत्नीरूप हो जानेवाले उन महाभाग्यवान्‌ मित्रों ने उसी तरह दूसरे-दूसरे चित्र-विचित्र देशों में और पर्वतो पर रहकर खूब विहार किया | तदनन्तर धीरे-धीरे कुछ महीनों के व्यतीत हो जाने के पश्चात्‌ देवपुत्र का स्वरूप धारण की हुई वह चूडाला विचार करने लगी । अब मैं सुन्दर-सुन्दर नानाविध उपभोगों से शिखिध्वज की परीक्षा करूँगी। परीक्षा के द्वारा इसकी अनासक्ति मैं जब दृढ़ कर दूँगी, तभी यह फिर कभी भोगों में प्रम नहीं करेगा | यों विचार कर चूडाला ने जंगलभूमि में अपनी माया से देवताओं ओर अप्सराओं के साथ-साथ आये हुए इन्द्र को दिखलाया । अपने परिवार के साथ आये हुए इन्द्र को देखकर वन में वास किये हुए राजा शिखिध्वज ने पहले उनकी यथाविधि अर्घ्य, पाद्य आदि से पूजा की (फिर उनसे प्रश्न किया)