Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, Verses 22–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, verses 22–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 22-26
संस्कृत श्लोक
पादुकागुटिकाखङ्गरसादीदमथापि च ।
गृहीत्वा सिद्धमार्गेण स्वीकुरु स्वर्गमण्डलम् ॥ २२ ॥
आगत्य विविधा भोगास्त्वया विबुधसद्मनि ।
जीवन्मुक्तेन भोक्तव्यास्तेन त्वामहमागतः ॥ २३ ॥
विमानयन्ति संप्राप्तां न तिरस्करणैः श्रियम् ।
नाभिवाञ्छन्ति न प्राप्तां त्वादृशाः साधु साधवः ॥ २४ ॥
अविघ्नमागतेनाद्य सुखं विहरता त्वया ।
स्वर्गः पवित्रतां यातु हरिणेव जगत्त्रयम् ॥ २५ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
सर्व स्वर्गसमाचारं वेद्मि देवाधिनायक ।
किंतु सर्वत्र मे स्वर्गो नियतो न तु कुत्रचित् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में गमन करने की तो मुझ में शक्ति है नही, फिर मैं स्वर्ग में कैसे आऊँ, इस पर कहते हैँ ।
राजन्, और भी इन सिद्धपादुका, गुटिका, खड्ग, पारद आदि का स्वीकार कर सिद्धो के मार्ग से
आप स्वर्गमण्डल में आने का अंगीकार कीजिए। हे तत्त्वज्ञ, आपके सरीखे जो साधु महात्मा हैं, वे अपने
पास आई हुई लक्ष्मी का अस्वीकार कर अपमान नहीं करते ओर अप्राप्त लक्ष्मी की अभिलाषा भी नहीं
करते। महात्मन्, जिस तरह भगवान् नारायण के आगमन से तीनों लोक पवित्र होते हैं, वैसे ही निर्विघ्न
सुखपूर्वक विहार कर रहे आपके आगमन से आज ही स्वर्ग पवित्र हो जाय । राजा शिखिध्वज ने कहा :
हे देवताओं के अधिनायक, मेरा मन्तव्य तो यह है कि सभी स्थल (देश) स्वर्ग के सदृश ही सुखप्रद है;
क्योकि मैं जिस भूमानन्दात्मक परम आत्मा को स्वर्ग मानता हूँ, उसकी सर्वत्र सत्ता है । मेरे लिए कहीं
पर परिच्छिन्न है नहीं