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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, Verses 1–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, verses 1–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 1-8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ सूर्याख्यरङ्गेण रञ्जिते भुवनोदरे । शिखिध्वजाङ्गना प्रातर्मदनी कुम्भतां ययौ ॥ १ ॥ एवं महेन्द्रदर्यां तावुभौ कुम्भशिखिध्वजौ । स्वयं विवाहिताविष्टौ संपन्नौ देवदंपती ॥ २ ॥ विलेसतुर्विचित्रासु प्रत्यहं वनराजिषु । प्रपक्वफलभारासु पुष्पपल्लविनीषु च ॥ ३ ॥ दिवा प्रीततरौ मित्रे यामिन्यामिष्टदंपती । प्रभादीपाविव श्लिष्टौ न वियुक्तौ बभूवतुः ॥ ४ ॥ रेमाते वनकुञ्जेषु गुहासु च महीभृताम् । तमालजालखण्डेषु मन्दारगहनेषु च ॥ ५ ॥ सह्यदर्दुरकैलासमहेन्द्रमलयेषु च । गन्धमादनविन्ध्याद्रिलोकालोकतटेषु च ॥ ६ ॥ दिनैस्त्रिभिस्त्रिभिर्गत्वा निद्रां गतवति प्रिये । चूडाला राजकार्याणि कृत्वा स्वभ्याययौ पुनः ॥ ७ ॥ तौ दिवा सुहृदौ मित्रे दंपती कुम्भभूमिपौ । नानाकुसुमसंवीतौ तस्थतुर्मुदितौ मिथः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ छठा सर्गं समाप्त एक सौ सातवाँ सर्ग अनेक पर्वतो पर विहार, राजा की अनासक्ति की परीक्षा के लिए माया से इन्द्रदर्शन करना तथा स्वर्ग को बुलाना आदि - इन सबका वर्णन । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, रात बीत जाने के बाद, जब कि प्रभात में अंशुमाली सूर्य के लाल रंगने समस्त भूवन का कोना-कोना रग दिया, तब शिखिध्वज की भार्या मदनिका अपने पहले के कुम्भरूप में आ गई । श्रीरामजी, मैंने आपसे जैसे कहा, वैसे वे दोनों कुम्भ ओर शिखिध्वज स्वतः विवाहित हो गये ओर देवताओं के सदृश भोगसामग्री से पूर्ण होने के कारण वे प्रिय देवदम्पती ही बन गये । प्रतिदिन ऐसी चित्रविचित्र वनपंक्तियो मे विलास करते थे, जहाँ कि पके-पके फलों के समूह भरे पडे रहते थे ओर पल्लवो की अनोखी शोभा निखरती रहती थी । दिन में तो वे अत्यन्त प्रिय मित्र बन जाते थे ओर रात में प्रिय पतिपत्नी बन जाते थे । प्रभा ओर दीपक की नाई इतने वे मिले-जुले थे कि कभी अलग होते ही नहीं थे । उन्होने अरण्य के कुंजों मे, पर्वतो की गुफाओं में, मन्दारवृक्षों से अतिगहन (घने) तमालवृक्षों की झाड़ियों में, सह्याद्रि, दर्दुर, कैलास, महेन्द्र, मलय, गन्धमादन, विन्ध्याचल तथा लोकालोक पर्वत ओर नदियों के तटों मे रमण किया | तीन दिन बीत जाने के बाद जब कि उसके पति निद्रा ले रहे थे, तब वह चूडाला अपने नगर की ओर जाकर वहाँ राजकार्यो का सम्पादन कर फिर वापस आ गई । वे कुम्भ ओर शिखिध्वज, जो दिन में स्वच्छहृदय मित्र ओर रात के प्रिय पति-पत्नी थे, अनेक तरह के पुष्पों से मालित होकर परस्पर अत्यन्त मुदित रहते थे