Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 63, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 63, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 63 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अलमतिविततैर्वचःप्रपञ्चैरियमुचितेह सुखाय दृष्टिरेका । उपशमितरसं समं मनोऽन्तर्यदि मुदितं तदनुत्तमा प्रतिष्ठा ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि सभी वस्तुएँ असारभूत हैं, तो आश्रय करने योग्य सारभूत वस्तु कौन है ? इस प्रश्न पर सारभूत वस्तु बतलाते है । मित्रवर, अब इस विषय में अधिक वाक्यों का प्रयोग करना व्यर्थ है यदि अन्तःकरण चारों ओर से रागमुक्त होकर तथा समस्त विक्षेपरूपी विषमता से रहित होकर अपने आत्मस्वरूप में ही परितृप्त रहे, तो वही सबसे उत्तम विश्रान्ति हे । सर्वातिशायी सुख के लिए केवल इसी एक दृष्टि का सदा सर्वदा आश्रय करना उचित हे