Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 63
बासठवाँ सर्ग समाप्त तिरसठवाँ सर्ग राजा परिघ के द्वारा परीक्षण के अनन्तर जिसकी स्तुति की गई है, ऐसे तत्त्ववित् सुरघु का अपनी सजग स्थिति का सविस्तार वर्णन |
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- Verse 1परिघ ने कहा : राजन्, आप निश्चितरूप से तत्त्व को जान चुके हैं और उस उत्तम परम पद की प्राप…
- Verse 2हे महाराज, स्नेह के कारण अत्यन्त मधुर, सुशीतल, आनन्दरूपी पुष्परस से परिपूर्ण, उत्तम श्री…
- Verse 3जैसे तट के झंझावात के झकोरो से निर्मुक्त तथा निर्मलत्व आदि गुणों से युक्त विस्तृत समुद्र…
- Verse 4आकाश
- Verse 5हे राजन्, आप सभी इष्ट ओर अनिष्ट विषयों मे एक-से दिखाई देते हैं, सभी विषयों में आप सन्तुष…
- Verse 6महाराज, आपने अपनी उत्तम बुद्धि से क्या सार है एवं क्या असार है, इसका विचारपूर्वक निर्णय क…
- Verse 7सत् ओर असत् के निर्णय के तत्त्व को जाननेवाले हे राजन् प्रसन्न चित्त से युक्त तथा आरोह…
- Verse 8हे भाग्यवान्, जैसे समुद्र फेन अन्दर में अवस्थित अमृत से तृप्त रहा करता है, वैसे ही जिसकी…
- Verse 9परिघ द्वारा कथित अर्थ का सभी युक्तियो से समर्थन ओर अनुमोदन कर रहे युरघु कहते है। सुरघु ने…
- Verse 10उपादान करने योग्य वस्तु का अभाव होने के कारण कुछ भी हेय यानी त्याज्य नहीं है, क्योंकि जिस…
- Verse 11यदि शंका हो कि जो तुच्छ है, वह हेय ओर जो अतुच्छ है, वह उपादेय क्यो नहीं होगा ? तो इस पर क…
- Verse 12संसार में देश और काल के प्रभाव से तुच्छ में अतुच्छत्व और अतुच्छ में तुच्छत्व भावना हो जात…
- Verse 13लोक में निन्दा ओर स्तुति दोनों राग से होते हैं और राग इच्छा को कहते हैं, जिसकी बुद्धि निर…
- Verse 14इस त्रिलोकी में स्तर्यो, पर्वत, समुद्र, वनपंक्तियाँ आदि भूत सत्यता से रहित हैं, वास्तव मे…
- Verse 15इस मांस और अस्थिमय अध्यात्म जगत में तथा काष्ठ, मृत्तिका ओर शिलामय अधिभूतजगत् में, जो कि…
- Verse 16राजन्, जैसे दिवस- शोभा का विनाश हो जानेपर तदनुगामी प्रकाश और ताप दोनों का विनाश हो जाता…
- Verse 17यदि सभी वस्तुएँ असारभूत हैं, तो आश्रय करने योग्य सारभूत वस्तु कौन है ? इस प्रश्न पर सारभू…