Guru's AddaGuru's Adda

Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 26

10 verse-groups

  1. Verses 1–2पचीसवाँ सर्गे समाप्त छब्बीसवाँ सर्ग स्मृति से बलि के समीप गये हुए शुक्राचार्य के बलि के प…
  2. Verse 3तदनन्तर भगवान शुक्राचार्यजी, जो सर्वगत अनन्त चिदात्मा हे, देहसहित अपने को बलि के रत्नमय झ…
  3. Verse 4बलि, जिनका शरीर गुरु की देहप्रभा से सुशोभित था, जैसे प्रातःकालमे सूर्य की किरणों से विकसि…
  4. Verse 5वहाँ पर बलि ने रत्नमय अर्घ्य के प्रदान से, मन्दार वृक्ष के फूलों की राशियों से ओर पादाभिव…
  5. Verses 6–7हे भगवन्‌, जैसे सूर्य की प्रभा सन्ध्यावन्दन आदि कार्य करने के लिए लोगों को प्रेरित करती ह…
  6. Verses 8–9भगवन्‌, महामोह देनेवाले भोगों के प्रति मेँ विरक्त हूँ, जो अपने ज्ञानमात्र से महामोह का ना…
  7. Verses 10–12शुक्राचार्यजी ने कहा : हे सर्वदानवराजेन्द्र, इस विषय में बहुत कहने से क्या लाभ है ? मैं आ…
  8. Verses 13–14चित्‌ की जो चेत्याकार कल्पना है, वही बन्ध है, उससे मुक्ति मोक्ष कहलाता है। चेत्याकाररहित…
  9. Verse 15मैं देवलोक में जाता हूँ, यहीं पर सप्तर्षि मुझे मिले थे, वहाँ पर किसी देवकार्य से मुझे जान…
  10. Verses 16–17यदि बलि की ओर से यह प्रश्न हो कि आप मुक्त हैं, अतएव कृतकृत्य हैं, यदि आप वहाँ पर न जायें,…