Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ स्थितिप्रकरणादनन्तरमिदं श्रृणु ।
उपशमप्रकरणं ज्ञातं निर्वाणकारि यत् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उपशम प्रकरण
पहला सर्ग
मध्याह्लकाल की शंखध्वनि से सभा के उत्थान का वर्णन तथा वसिष्ठजी का
आह्लिककृत्य और रात्रि में विश्वामित्रजी के साथ स्थिति |
उत्पत्ति प्रकरण में सृष्टि की प्रतिपादक सब श्रुतियों के तात्पर्य को स्पष्ट करने के लिए सारी प्रपंच
रचना मन के अधीन ही है, यह दर्शाया। स्थिति प्रकरण में भी जगत की स्थिति का प्रतिपादन करनेवाली
सब श्रुतियों के तात्पर्य को दिखलाने के लिए सारी प्रपंच स्थिति मन के अधीन ही है, यह दिखलाया।
अब या गार्ग्यमरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति" (हे गार्ग्य जैसे अस्त
हो रहे सूर्य की किरणे सर्वजनप्रत्यक्ष तेजोराशिरूप तेजोमण्डल में एकस्वरूपता को प्राप्त होती हैँ ।
फिर वे मरीचियाँ दूसरे दिन सूर्य का उदय होने पर सव दिशाओं में संवार करती हैं, वैसे ही सव वागादि
इन्द्रियाँ सब व्यवहारो के कारणभूत अन्तःकरण में स्वप्न के समय एकता को प्राप्त होती हैं ।),
“सुषुप्तिकाले सकले विलीने“ (आनन्दभोग के समय सव विश्व विज्ञान के स्वकारण में लीन होने पर)
यत्म्रयन्त्यभिसंविशन्ति“ (जिस कारणभूत ब्रह्म मे विनाश के समय मरते हुए भूत प्रवेश करते है),
“यथा नद्यः स्पन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्तिनामरूपे विहाय” (जैसे बह रही नदियाँ अपने नाम और रूप
का त्याग करके समुद्र में लीन हो जाती हैं), गताः कलाः पचदशप्रतिष्ठानम्" (मोक्ष के समय ज्ञानी के
प्राण, श्रद्धा, पाँच महाभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म ओर लोभरूप पन्द्रह कलाएँ
अपने कारण में प्राप्त हो जाती हैं) और “एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायषा: पुरुषं
प्राप्यास्तं गच्छन्ति“ (इस दरष्टा की ये सोलह कलाएँ, जिनका पुरुष स्थान है, पुरुष को प्राप्त करके
यानी पुरुषात्मभाव को प्राप्त होकर अस्त को प्राप्त होती हैं ।) चुबुप्ति, प्रलय, समाधि, साक्षात्कार
और विवेहकैवल्य में प्रपंच की निवृत्ति होने के कारण जीव की ब्रह्मरूपताप्राप्ति के प्रतिपादन द्वारा
प्रत्यकूब्रह्मैकरस अखण्ड वस्तु की लक्षक पूर्वोक्त इन श्रुतियों के भी मन का नाश होने से ही सारे प्रपंच
की निवृत्ति द्वारा स्वरूप प्रतिष्ठा में तात्पर्य है, इस रहस्य का उद्घाटन करने के लिए उपशम प्रकरण
का आरम्भ कर रहे श्रीवसिष्ठजी पूर्व और उत्तर प्रकरणों की संगति दर्शाते हुए विषय और प्रयोजन को
दिखलाकर शिष्य को सुनने के लिए सावधान करते हुए कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, दृश्य की स्थिति का प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियों के तात्पर्य का वर्णन करने के
उपरान्त आप इस उपशम प्रकरण को सुनिये जो समझ में आने से मोक्षकारी हे