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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, Verses 2–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 1, verses 2–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 2-12

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । शरत्तारकिताकाशस्तिमितायां सुसंसदि । कथयत्येवमाह्लादि वसिष्ठे पावनं वचः ॥ २ ॥ श्रवणार्थित्वमौनस्थपार्थिवे संसदन्तरे । निर्वात इव निस्पन्दकमले कमलाकरे ॥ ३ ॥ विलासिनीषु संशान्तमदमोहबलासु च । शममन्तः प्रयान्तीषु चिरप्रव्रजितास्विव ॥ ४ ॥ कराम्भोरुहहंसेषु लीनेषु श्रवणादिव । मुक्तघुर्घुरवादेषु वायसेषु तराविव ॥ ५ ॥ नासाग्रपरिविश्रान्ततर्जन्यङ्गुलिकोटिषु । विचारयत्सु विज्ञानकलां तज्ज्ञेषु राजसु ॥ ६ ॥ रामे विकासमायाते प्रभात इव पङ्कजे । परित्यक्ततमः पीठे सूर्योदय इवाम्बरे ॥ ७ ॥ आकर्णयति वासिष्ठीर्गिरो दशरथे रसात् । कलापिनीव जीमूतनिर्ह्रादान्मुक्तवर्षणात् ॥ ८ ॥ आहृत्य सर्वभोगेभ्यो मनो मर्कटचञ्चलम् । श्रवणं प्रति यत्नेन सारेण मन्त्रिणि स्थिते ॥ ९ ॥ वसिष्ठोक्त्या परिज्ञातस्वात्मनीन्दुकलामले । लक्ष्मणे विलसल्लक्ष्ये शिक्षावलविचक्षणे ॥ १० ॥ शत्रुघ्ने शत्रुदलने चेतसा पूर्णतां गते । अलमानन्दमायाते राकाचन्द्रोपमे स्थिते ॥ ११ ॥ सुमित्रे मित्रतां याते मानसे दुःखशीलिते । विकासिहृदये जाते तत्काल इव पंकजे ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यहाँ पर स्थिति का प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियों के तात्पर्य का वर्णन करने के पश्चात उपसंहार बोधक श्रुतियों के तात्पर्य वर्णन की अवसर संगति है । (ज्ञातं निर्वाणकारि यत्‌* से पूर्व प्रकरण का प्रयोजन ही इसका प्रयोजन है, जो दोनों की एक कार्यकारिता संगति भी दिखलाई, यह जानना चाहिये । श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : वत्स भरद्वाज, जब देवता, ऋषि, मुनि, राजा आदि की सुन्दर सभा शरद्‌ ऋतु में तारों से ठसाठस भरे हुए आकाश के तुल्य निश्चल थी, श्रीवसिष्ठजी इस प्रकार मन को आनन्द में डुबानेवाले पवित्र वचन कह रहे थे । वायुरहित अतएव निश्चल कमलवाले कमलों के तालाब की नाईं सभा का मध्यभाग वसिष्ठजी के ज्ञानपूर्ण वचन सुनने में उत्सुकतावश मौन होकर बैठे हुए राजाओं से पूर्ण था, विलासिनियों के मद और मोह का बल शान्त हो गया था, वे चिरसंन्यासिनियों की तरह अन्तःकरण में परम शान्ति को प्राप्त हो रही थी विलासिनी गण के कर कमलों में हंस-से मालूम हो रहे चँवर मानों वसिष्ठजी का उपदेश सुन लेने से श्रुत अर्थ में समाधि लगाकर लीन हो गये थे, वृक्ष की तरह सभा में पक्षियों ने अपना चह-चहाना बन्द कर दिया था, नासिका के अग्रभाग पर तर्जनी अंगुली के अग्रभाग को रख कर विचारवान राजा गण विज्ञानकला को विचार रहे थे प्रातःकाल में कमल की नाई श्रीरामचन्द्रजी विकसित हो उठे थे । जब सूर्य के प्रकटकाल में आकाश अन्धकाररूपी आसन का त्याग कर चुका था। (अन्धकार भूमि मेँ ही घन होता है अतएव ऊपर स्थित आकाश के आसनरूप से उसकी उत्प्रेक्षा की गई है । भाव यह है कि जैसे गुरुजनों के आने पर शिष्य उनका अभ्युत्थान करता हुआ आसन का त्याग करता है वैसे ही सूर्य के उदय होने पर आकाश ने अन्धकाररूपी आसन छोड़ दिया था), महाराज दशरथ जैसे मयूर वृष्टि के कारण हुई आर्द्रता से मेघ के शब्द सुनता हे वैसे ही प्रेमार्द्रभाव से श्रीवसिष्ठजी के उपदेश वचन सुन रहे थे, बन्दर की तरह चंचल मन को सब विषय भोगों से हटाकर मन्त्री लोग बड़े प्रयत्न के साथ सुनने में लगे थे, श्रीवसिष्ठजी के उपदेश वचनों से लक्ष्मणजी के हृदय में ब्रह्म का स्फुरण हो रहा था, उन्हें आत्मतत्त्व का परिज्ञान हो चुका था तथा वे चन्द्रमा के खण्ड के समान निर्मल और शिक्षा बल से विचक्षण हो गये थे, शत्रुओं का संहार करनेवाले शत्रुघ्नजी चित्त से पूर्णता को प्राप्त हो चुके थे, पूर्ण आनन्द को प्राप्त वे पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा के समान स्थित थे, दुःखी मन के वशीभूत हो जाने पर सुमित्र मन्त्री का हृदय जैसे मानसरोवर में दुःख से चिन्तित सुन्दर सूर्य के उदय द्वारा प्रीतिकर होने पर प्रातःकाल के कमल विकसित हो उठते हैं वैसे ही विकसित हो उठा था