Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 9
13 verse-groups
- Verse 1नौवाँ सर्ग भृगु ऋषि के समीप में स्थित मृतप्राय शुक्र शरीर के पतन और सूखने का वर्णन | श्री…
- Verse 2इसके अनन्तर अधिक समय बीतने के कारण वायु और धूप से जर्जरित हुआ शुक्राचार्य का शरीर, जिसकी…
- Verse 3किन्तु चंचल शरीरवाले मन ने तो पुनः पुनः अपने से कल्पित स्वर्गगमन आदि-आदि विचित्र धाराओं म…
- Verse 4उसके मन को, जिसने विविध भोगों की कल्पनाओं से भ्रमण किया, जन्म-मरण परम्पराओं की कल्पना से…
- Verse 5शुक्राचार्य अपने शरीर की कुछ भी परवाह न कर अनन्त वृत्तान्तो से भरी हुई मन की कल्पनामात्र…
- Verse 6उस धीमान का मन्दराचल के शिखर पर स्थित वह स्थूल शरीर ताप की अधिकता से सूखकर बाहर केवल चर्म…
- Verse 7वह शरीर अभिमान दुःख के क्षय से प्राप्त आनन्द के कारण शरीर के छिद्रों मे बह रहे वायु से, ब…
- Verse 8वह शरीर संसार भूमिय में भोगाशारूपी गड मे पूर्वोक्त रीति से गिरे हुए बेचारे मन का सफेद मेघ…
- Verse 9वह शरीर मुखमण्डलरूपी अरण्य में पुराने अंधे कुओं के तुल्य नाक, आँख, मुँह आदि के गङ्ख की शो…
- Verse 10पहले सूर्य संताप से तपाया गया, ताप से तपने के बाद वर्षाऋतु की मूसलाधार वृष्टि से सींचा गय…
- Verses 11–14चण्डालिन के (तेज ओंधी के) विलास से वनभूमियों मेँ इधर-उधर लुढकता था ओर वर्षाऋतु के आने पर…
- Verse 15उस पवित्र आश्रम में रागद्वेष की कहीं गन्ध भी न थी और महर्षि भृगुजी महातपस्वी थे, अतएव शुक…
- Verse 16शुक्राचार्य का चित्त, जिसने कि यम और नियमों से अपनी शरीरयष्टि को कृश बना डाला था, तपस्या…