Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 9, Verses 11–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 9, verses 11–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 11-14
संस्कृत श्लोक
चन्द्रानिलविलासेन लुलिता वनभूमिषु ।
धारानिकरपातेन विनुन्ना जलदागमे ॥ ११ ॥
प्रावृण्निर्झररूपेण प्लुता गिरिनदीतटे ।
पांशुना पवनोत्थेन दुष्कृतेनेव रूषिता ॥ १२ ॥
शुष्ककाष्ठवदालोला वातेषु कृतखाकृतिः ।
तारमारुतसीत्कारे वने तप इवास्थिता ॥ १३ ॥
वक्रा शुष्कान्त्रतन्त्री च भूतभाङ्कारकारिणी ।
अरण्यलक्ष्भीर्बाल्येव शून्या चर्ममयोदरी ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
चण्डालिन के (तेज ओंधी के) विलास से वनभूमियों मेँ इधर-उधर लुढकता था ओर वर्षाऋतु के
आने पर वृष्टि की धाराओं के निपात से ताडित होता था, पर्वत की नदी के तट पर वर्षऋतु के झरने के
तुल्य गेरु आदि धातुओं के रंग से रंगा गया था, आँधी से उड़ी हुई धूलि से, जो पाप के सदृश थी, वह
सना था। सूखे काठ के समान वह चंचल था, वायु बहने पर आकाश में भोजने से उत्पन्न हुआ तलवार
का सा शब्द करता था, तेज वायु की साँय-साँय से भरे हुए वन में मानों वह तपस्या करता था । वह
शुक्राचार्य का शरीर टेढा हो गया था, उसके आँतरूपी तन्तु सूख गये थे, वह प्राणियों को डरानेवाली
भीषण ध्वनि करता था, वह अलक्ष्मी के तुल्य था, आहार से शून्य था, अतएव उसके पेट में केवल
चमड़ा ही वच गया था