Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 62, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 62, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 43
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
दैनिक
क्रियाओं के साथ सूर्य भगवान के अस्ताचल की ओर प्रस्थान करने पर तथा रात्रिक्रियाओं के साथ
चन्द्रमा के उदित होने पर रेशमी चादरों से युक्त शय्या ओं पर तथा आसनं पर बैठकर भूमि पर विहार
करनेवाले मुनि, राजे, राजपुत्र तथा महर्षि लोग अत्यन्त आदरपूर्वक वसिष्ठ महर्षि के वदनकमल से
निर्गत संसारतरण के उपाय का यथावत एकाग्र चित्त से विचार करने लगे ॥४ ०-४ २॥ तदनन्तर प्रहरमात्र
में वे श्रेतागण, जो रात्रि के निर्गमन की अभिलाषाओं के कारण दिनार्थी (रात्रि के अतिक्रमण की
अभिलाषावाले) कमल के सदृश थे, सुन्दर स्वप्न से युक्त निद्रा को प्राप्त हुए