Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, Verses 1–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 1, verses 1–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
उपशमप्रकरणादनन्तरमिदं श्रृणु ।
त्वं निर्वाणप्रकरणं ज्ञातं निर्वाणदायि यत् ॥ १ ॥
कथयत्येवमुद्दामवचने मुनिनायके ।
श्रवणैकरसे मौनस्थिते राजकुमारके ॥ २ ॥
मुनिवागर्थनिक्षिप्तमनस्यस्ततपःक्रिये ।
राजलोके गतस्पन्दे चित्रार्पित इव स्थिते ॥ ३ ॥
वसिष्ठवचसामर्थं विचारयति सादरम् ।
लसदङ्गुलिभङ्गेन मुनिसार्थे स्फुरद्भुवि ॥ ४ ॥
विस्मयालोकनोल्लासप्रोत्फुल्लनयनालिनि ।
पुरन्ध्रिवर्गे गम्भीरतरुमञ्जरितां गते ॥ ५ ॥
खे वासरचतुर्भागदेशे दिनकरे स्थिते ।
किंचिज्ज्ञानोदयात्सौम्ये किंचिच्छममुपेयुषि ॥ ६ ॥
श्रवणायेव संशान्ते वितानस्पन्दमालिते ।
मौनं मरुति मन्दारमधुरामोददायिनि ॥ ७ ॥
पुष्पदामसुषुप्तासु महाभ्रमरपंक्तिषु ।
ज्ञातज्ञेयतया नूनं सम्यग्ध्यानवतीष्विव ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
को कहने की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी पहले आपके प्रश्नों का उत्तर कहने के लिए यह अवसर नहीं है,
ऐसा कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, सिद्धान्तकाल में (निर्वाण प्रकरण के उत्तरार्ध में
पाषाणाख्यायिका आदि कहने के अवसर पर) इस प्रश्न का स्थिर उत्तर मैं आपसे कहूँगा। जिससे आप
इसे तत्त्वतः जान जायेंगे