Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 29, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 29, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 9-10
संस्कृत श्लोक
भववासनया ग्रस्ता मोहवासनया ततः ।
आशापाशनिबद्धास्ते ततः कृपणतां गताः ॥ ९ ॥
मुग्धेव ह्यनहंकारैर्ममत्वमुपकल्पितम् ।
रज्ज्वां भुजङ्गत्वमिव दामव्यालकटैस्ततः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर विहित-निषिद्ध प्रवृत्ति की वासना से वे ग्रस्त हुए । तदनन्तर मेरा शरीर नीरोग, दृढ़ और
भोगसमर्थ हो, इत्यादि मोहवासना से ग्रस्त हुए तदनन्तर आशारूपी पाशो से बधे हुए वे मुग्धा के
समान कृपणता को प्राप्त हुए । तदनन्तर जैसे रस्सी में सर्पत्व की कल्पना होती हे ऐसे ही अहंकारशून्य
दाम, व्याल ओर कट ने ममता की कल्पना की