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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

आकाशनगरोद्यानरचितासुरमन्दिरः । कुत्रिमोत्तमचन्द्रार्कभूषितात्मीयमण्डलः ॥ ८ ॥ शिलाशकलसंभूतपद्माद्यैरमराचलः । अनन्तविभवारम्भपरिपूरितदानवः ॥ ९ ॥ गृहरत्नाङ्गनागेयजितामरवधूध्वनिः । चन्द्रबिम्बकलापूर्णक्रीडोपवनपादपः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

उसने आकाश में कल्पित नगरों के उद्यानों में राक्षसों से मन्दिर बना रक्खे थे, बनावटी उत्तम चन्द्रमा और सूर्य से उसने अपने प्रदेश को विभूषित कर रक्खा था, पत्थर के टुकड़ों की नाई सर्वत्र सुलभ पद्मराग आदि मणियों से वह देवपर्वत मेरु के तुल्य हो गया था। असीम धनसम्पत्तियों के निर्माण से उसने सब दानवों को मालामाल कर दिया था। घर में स्थित रत्नरूप स्त्रियों के गान से उसने अप्सराओं की गानध्वनि को जीत लिया था। उसके क्रीड़ा के उपवन के वृक्ष चन्द्रबिम्ब की कलाओं से पूर्ण थे