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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 54–55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 54,55

संस्कृत श्लोक

अर्धोन्मीलितदृश्यभ्रूमध्ये तारकवज्जगत् । व्योमात्मैव सदाभासं स्वरूपं योऽभिपश्यति ॥ ५४ ॥ यस्यान्यदस्ति न विभोः कारणं शशशृङ्गवत् । यस्येदं च जगत्कार्यं तरङ्गौघ इवाम्भसः ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकर जीवन्मुक्तदशा मे बाधित जगत्‌ का आभासरूप दर्शन भी वही है, ऐसा कहते हैं । जैसे योगी खेचरी मुद्रा में दो भौहों के बीच में दृष्टि रखने पर अर्धोन्मिलित नेत्र से दृष्य भौहों के मध्यमें नेत्रों की कालीपुतलीको लगा कर अस्फुट होने के कारण सदा आभासरूप जगत्‌ को देखते हैं, वैसे ही जो आकाशरूप सदाभासस्वरूप को देखता है, वह भी सद्रूप ही है। जैसे खरगोश के सींग कोई कारण नहीं है, वैसे जिस सर्वव्यापक का कोई दूसरा कारण नहीं है और जैसा जल का तरंग समूह कार्य है, वैसे ही जिस सर्वकारण का यह जगत्‌ कार्य हे